प्रतीक्षा

आज कॉलेज का वातावरण बेहद चहल पहल भरा थाI वार्षिक समारोह की तैयारी बड़े जोर शोर से चल रही थी Iबस कुछ ही देर बाद कार्यक्रम प्रारंभ होने वाला था Iसभी प्रतिभागी अपने- अपने कार्यक्रम की तैयारी कर रहे थे I कोई नाटक के अपने हिस्से के संवाद याद करने में व्यस्त था तो कोई ग्रुप अपने डांस के स्टेप्स एकदम साथ करने का अभ्यास कर रहा था और गायन प्रतियोगिता के प्रतिभागी प्रस्तुत किये जाने वाले गीतों को गुनगुना रहे थे I सुधांश एक कोने में खड़ा सब कुछ चुपचाप देख रहा था क्योंकि वह किसी से भी परिचित नहीं था I उसे तो कॉलेज पूर्ण किये हुए लगभग पांच वर्ष हो चुके थे I वह अपनी छोटी बहन सुधा के ग्रुप का नाटक देखने यहाँ आया हुआ था I सुधा की इच्छा थी कि वह भी उसके अभिनय को देखे और सुधा की ज़िद के आगे उसकी चले यह तो असंभव सी बात थी I यह अलग बात है कि यहाँ आ कर उसकी अपनी कॉलेज की पुरानी यादें ताज़ा हो गयी थीं I कई पुराने मित्र याद आ रहे थे जिनसे अब कोई संपर्क नहीं था और जो अपने जीवन का लक्ष्य पाने के क्रम में न जाने कहाँ चले गए थे I अतीत की स्मृतियों में खोए हुए सुधांश की नज़र यकायक एक लडकी पर आकर ठहर गयी जो एक कोने में कत्थक नृत्य का अभ्यास कर रही थी I न जाने कैसे उसके आकर्षण में बँधा सुधांश उसके पास पहुँच गयाI अभ्यास में व्यस्त वह लड़की अचानक अपने समक्ष एक अपरिचित को पाकर असहज हो गयी और उसने अपना नृत्य रोक दिया I “अरे! आप रुक क्यों गयीं ?आप बहुत अच्छा नृत्य कर रही थीं इसीलिये तो मैं यहाँ आया था किन्तु लगता है मैंने आपके अभ्यास में व्यवधान डाल दिया I सत्य कह रहा हूँ ना ?” सुधांश ने अफसोस जताते हुए कहा I
नहीं नहीं ऐसी कोई बात नहीं है -उसने संकोच के साथ उत्तर दिया I
आप बहुत बेहतर नृत्य कर रही थीं तो मुझसे रहा नहीं गया और करीब से देखने की चाह में यहाँ आ गया I वैसे कौन सा गीत था ? सुधाश बातों को आगे बढ़ाते हुए बोला I
“मोहे पनघट पर नंदलाल छेड़ गयो रे ” वह अपना सामान समेटते हुए बोली I
अहा ! मुगले आज़म फिल्म का गीत है यह तो , यह मेरा अब तक का सबसे प्रिय गीत है Iअब तो मंच पर आपका नृत्य देखना एक यादगार अनुभव रहेगा I क्या मैं आपका नाम जान सकता हूँ? वैसे पहले अपना नाम बता दूँ मैं सुधांश हूँ I मेरी बहन सुधा आपके कॉलेज में पढ़ती हैऔर मैं यहाँ उसके ग्रुप का नाटक देखने के लिएयहाँ आया हूँ I
अच्छा , आप सुधा के भाई हैं I मैं जानती हूँ उसे , वह वह ही बहुत सुन्दर अभिनय करती है I मेरा नाम अरुणिमा है मैं एम0 ए0 द्वितीय वर्ष की छात्रा हूँ और सुधा मुझसे एक वर्ष जूनियर है I अच्छा, अब मुझे आज्ञा दें मुझे नृत्य की प्रस्तुति हेतु तैयारियाँ करनी हैं – कहते हुए वह अपना सारा सामान उठा कर वहाँ से चली गयी I
कमान जैसी तनी हुई भवें , बड़ी बड़ी आँखें, घनीं पलकें और गालों पर नाम के अनुरूप अरुणिमा बिखरी हुई जो उससे बातें करते वक़्त कुछ और गहरी हो गयी थी Iसुधांश सम्मोहित सा उसे जाता हुआ देखता रहा फिर कुछ देर में सजग होकर कॉलेज के सभागार की तरफ चल पड़ा I
यूँ तो सुधांश सारे कार्यक्रम देख रहा थाI किन्तु पहले के कार्यक्रमों में उसका मन इस वजह से नहीं लगा कि वह अरुणिमा के नृत्य की प्रतीक्षा कर रहा था और उसके नृत्य के बाद तो बस उसका नृत्य और आकर्षक मुद्राएं मानो उसकी आँखों के सामने से हट ही नहीं रहे थे I सुधा का अभिनय तो वह देख ही नहीं सका था क्योंकि वह नाटक कब प्रस्तुत किया गया इसका उसे पता ही नहीं चला I तभी तो घर लौटते समय सुधा ने जब उससे अपने प्रदर्शन के विषय में पूछा तो वह कोई टिप्पणी नहीं कर सका था सिवाय “बहुत अच्छा” कहने के I सुधा उसका बदला बर्ताव देख कर अचंभित थी I उसने सुधांश से तुरंत कार रोकने को कहा और जैसे ही सुधांश ने कार रोकी वह बोली ” भैया आज आप कहीं खोये हुए है , क्या बात है? I मैं जानती हूँ कि आप सभागार में बैठे अवश्य थे किन्तु मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि आपने मेरा अभिनय नहीं देखा क्योंकि मानसिक रूप से तो आप कहीं और थे I अन्यथा आप इस तरह मेरे द्वारा रचित और अभिनीत नाटक की जिसके लिए मैंने इतना परिश्रम किया था इस तरह उपेक्षा कदापि नहीं करते I इतना तो मै निश्चित रूप से कह सकती हूँ कि आप दुखी नहीं है बस उलझन में हैं I आप चाहे तो वह उलझन मुझे बता सकते हैं , हो सकता है मैं आपकी कुछ सहायता कर सकूँ I” सुधा की आँखों से शरारत साफ़ झाँक रही थी जिसे सुधांश ने पढ़ भी लिया अतः उसने समय गँवाना उचित नहीं समझा और सीधे मुद्दे पर आ गया I
अच्छा फिर ये बताओ कि वह लड़की कौन थी ?
“लड़की, कौन लड़की? ऐसे कैसे पता चलेगा कि आप किसकी बात कर रहे हैं, उसका कुछ नाम नहीं है?
सुधांश सोचने का अभिनय करते हुए बोला -“हाँ.. उसका नाम.. शायद अरुणिमा बताया था उसने Iअरे , वही जिसने कत्थक नृत्य प्रस्तुत किया था ”
“अच्छा , आप अरुणिमा दीदीके विषय में बात कर रहे हैं I किन्तु उन्होंने आपको अपना नाम कब बताया? क्या आप कॉलेज में उनसे मिले थे ? मिले तो कब मिले और उनका नाम क्यों पूछ रहे थे जब पहले से ही जानते हैं?” सुधा ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी I
“अब इतनी गहन पूछ – ताछ मत कर बस यह बता कि क्या तू उसे जानती है ,हाँ या नहीं I- सुधांश ने गंभीर होकर पूछा I
“ये लो अब इसमे इतना नाराज होने वाली क्या बात थी ? आप कुछ छुपा रहे हो मुझसे वरना इतना बुरा लगने वाली तो कोई बात नहीं की मैने बस सामान्य से कुछ प्रश्न थेI अब एक अपरिचित के लिए इतनी उत्सुकता थोड़ा सा संशय तो उत्पन्न करती ही है ना भाई? क्या कुछ गलत कह रही हूँ मैं”
“अरे यार I अब मुझसे और कोई प्रश्न मत कर बस जो पूछ रहा हूँ उसका जवाब देI शेष स्वयं ही समझ जा तो बेहतर होगा ठीक है? ”
“अच्छा बाबा कुछ नहीं पूछूँगी I वैसे समझ तो मैं तभी गयी थी जब आप उनका अभ्यास देखने एकदम उनके निकट चले गए थे I उसके बाद तो सारे कार्यक्रम में आप उनके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं देख सकेI यहाँ तक कि मेरा अभिनय भी नहीं जिसके लिए मैंने आपको विशेष रूप से आमंत्रित किया था I” सुधा मुँह बनाते हुए बोली I
“अब तू मेरे ह्रदय की बात भी तो समझ I आज से पहले इस प्रकार तुझसे कभी कुछ पूछा है मैंने ? इस बार तुझसे सहायता की आशा कर सकता हूँ या नहीं केवल इतना बता मुझको” कहते हुए सुधांश ने कार रोक दी I
अब सुधा को लगा कि मामला गंभीर है I बात सम्हालते हुए बोली -समझ रही हूँ भाई मैं तो बस यूँ ही .. अनुदी की पारिवारिक पृष्ठभूमि बेहद साधारण है I उनके पिताजी उन्हें होस्टल में रखने का व्यय वहन नहीं कर सकते है अतः वे यहाँ अपनी मौसी के घर पर रहतीं है जो कॉलेज से बहुत दूर है I लेकिन उनमें पढ़ने की जबरदस्त लगन है इसलिए रोज बस से दो घंटे का आना जाना करतीं हैं I कोई निजी वाहन भी तो नहीं है उनके पास ऊपर से घर का सारा काम भी करना पड़ता है उन्हें क्योंकि उनकी मौसी बीमार रहती हैं I किन्तु अपनी पढ़ाई पर कोई आँच नहीं आने देती हैं और स्वभाव, उसका तो कोई जवाब ही नहीं बहुत मधुर व्यवहार है I क्या आप अनु दी से मिलना चाहते हैं ? सुधा अपनी बातों अचानक अप्रत्याशित मोड़ देते हुए बोली I
सुधांश -“नहीं, पहले मैं जानना चाहता हूँ कि उसके ह्रदय में क्या है तभी आगे कुछ सोचूँगाI”
सुधा -“अच्छा यदि वह आपसे मिलने को तैयार हो जाती हैं तो समझ लेना कि आग उस तरफ भी लगी है हा.. हा… हा …और उन्हें आपसे कैसे मिलाना है यह मेरी जिम्मेदारी है ठीक है”
उस दिन के बाद सुधा अधिक से अधिक समय अरुणिमा के साथ बिताने लगी I वे अभी तक एक दूसरे से परिचित मात्र थीं I किन्तु अब यह परिचय मित्रता में बदल चुका था Iअरुणिमा की घनिष्ठ मित्र अंजली भी इस परिवर्तन को अनुभव कर रही थी I एक दिन उसने अनु से पूछ ही लिया -क्या बात है अनु ? आजकल सुधा तुम्हारे साथ कुछ अधिक घनिष्ठता बढ़ा रही है I पहले तो इतनी निकटता उसके साथ तुम्हारी कभी नहीं रही I
– दरअसल उस दिन सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान बातचीत प्रारंभ हुई थी बस तभी से …..
– अच्छा जिस दिन तुम सुधा के भाई से रिहर्सल के समय मिली थी … अंजली अरुणिमा को छेड़ने का उपक्रम करती हुई बोली I
– अंजली प्लीज़ ! अब तू बात को दूसरी दिशा में मत मोड़ I केवल इतना जान ले कि उसने मेरी तरफ मित्रता का हाथ बढाया और मैने उसे थाम लिया I इससे अधिक कुछ खोजबीन करने की कोई आवश्यकता नहीं है I
– अच्छा बाबा ठीक है आगे से कुछ नहीं कहूँगी I मेरे मन में बस जिज्ञासा जगी थी सो मैंने पूछ लिया I अब बुरा मत मान I
– अच्छी बात है – अरुणिमा मुस्कुराते हुए बोली I
कोई द्वार पर दस्तक दे रहा है I अरुणिमा द्वार खोल ज़रा -मौसी ने भीतर से आवाज़ दी तो अरुणिमा ने आकर दरवाजा खोला और देखा कि सुधा बाहर खड़ी थी I अरुणिमा उसे देख कर विस्मित होकर बोली -अरे सुधा ! तुम यहाँ कैसे ?
– दीदी बाहर ही खड़ा रख कर यूँ ही प्रश्न करेंगी या भीतर आने के लिए भी कहेंगी I
-अरे हाँ ! आओ भीतर आओ , आज अचानक अवकाश के दिन घर कैसे आना हुआ और घर का पता किसने दिया तुम्हें ?
-अंजली दीदी ने दिया आपका पता, ये बताएँ मौसीजी कहाँ हैं? उनसे आपको घर ले जाने की आज्ञा लेनी है I
-घर ले जाने की, क्यों ?
अरे भई ! मेरे माता पिता के विवाह की वर्षगाँठ के उपलक्ष्य में हमारे घर में आज रात एक छोटा सा आयोजन है I उसमें आपको आमंत्रित करने और आपको वहां आने के लिए मौसीजी की अनुमति लेने उपस्थित हुई हूँ I -कहते हुए सुधा भीतर की तरफ मौसी को ढूँढ़ते हुए चली गयी I
-मौसीजी प्रणाम ! मैं सुधा हूँ अनु दीदी के कॉलेज में पढ़ती हूँI आज मेरे घर में छोटी सी पार्टी है यदि आप आज्ञा दें तो मैं दीदी को उसमें आने के लिए आमंत्रित करना चाहती हूँ I
-पर बिटिया तुम हो कौन? मौसी ने एक हाथ से पल्लू सर पर डाल दूसरा हाथ पश्नावाचक मुद्रा में हाथ हिलाते हुए पूछाI I
– सुधा ने एक साँस में अपना पूरा परिचय दे डाला फिर कहा “मौसीजी दीदी को मैं अपनी कार से ले जाऊँगीऔर फिर पार्टी समाप्त होने पर घर तक छोड़ भी जाऊँगी I आपको शिकायत का कोई मौक़ा नहीं दूंगी I आपकी निश्चिंतता के लिए सूचित कर दूँ कि अंजली दीदी भी आ रही हैं” I
-अब हम क्या कहें l अनु बिटिया जाना चाहे तो उससे पूछ लो I अगर वह हाँ कहती है तो फिर ले जाओ पर अपनी जिम्मेवारी पर उसे घर छोड़ देना I ठीक है ? कहते हुए मौसी रसोईघर में चली गयी I
-“दीदी प्लीज़ चलिए ना! देखिये ना मत कीजियेगा वरना मेरा दिल टूट जाएगा.. प्लीज़ …प्लीज़…” सुधा अरुणिमा से उसके घर चलने के लिए हठ करने लगी I
अरुणिमा उसकी जिद के समक्ष पराजित होने का अभिनय करते हुए दोनों हाथ जोड़कर बोली “अच्छा बाबा चलूँगी पर अभी नहीं ,मुझे भी तो तैयार होना पड़ेगा कि नहींI हो सके शाम के वक़्त गाड़ी भेज देना मुझे लेने के लिए” I
-“नहीं दीदी अभी चलिए I केवल अपने कपड़े संग ले चलिए शेष सामान वहाँ मेरे पास है I चलिए ना …बहुत मज़ा आयेगा I अब आप ज्यादा ही नखरे दिखा रहीं है I एक दिन मेरा कहना नहीं मान सकती? बाकी लड़किया भी तो आ रही हैं …” सुधा कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थी I
अंततः उसके हठ के आगे अरुणिमा ने समर्पण कर दिया और उसके संग चल पड़ी I
समारोह के दौरान सुधांशु ने कई बार अरुणिमा से बातें की जिससे उसे यह अहसास तो हो गया था कि अनु भी उससे प्रभावित थी और वार्तालाप को उत्सुक भी ,यही तो वह जानना चाहता था Iजब अरुणिमा को घर वापस छोड़ कर आने का प्रश्न उपस्थित हुआ तो सुधांश ने बताया कि सारे ड्राईवर तो घर जा चुके हैं औरऐसे में स्वयं उसके जाने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं था I पार्टी के बीच में ही सुधा के सिर में बहुत तीव्र पीड़ा होने लगी थी अतः वह भी साथ जाने की स्थिति में नहीं थी I और जैसा कि तय था सुधांश अकेला ही कार से अरुणिमा को छोड़ने उसके घर तक गया I अरुणिमा सारे रास्ते सकुचाई सी बैठी रही I सारा सफ़र चुपचाप बीत गया, हाँ! बीच बीच में सुधांश बात शुरू करने की थोड़ा बहुत चेष्टा करता रहा था और अनु बस हाँ ,हूँ , में उत्तर देकर बात आगे बढ़ने के सारे मार्ग बंद कर देती I
अरुणिमा -कार रोकिये मेरा घर आ गया है I
अच्छा आप यहाँ रहती हैं -कहते हुए सुधांश ने कार रोक दी I
अब मैं चलती हूँ – अरुणिमा कार का द्वार खोल कर बाहर आ गयी I
सुधांश को नमस्कार कर अनु अपने घर की ओर मुडी ही थी कि सुधांश ने उसे आवाज़ दी -सुनिए !
आवाज सुनकर अरुणिमा ने पलट कर पूछा -कहिये , क्या बात है ?
सुधांश -क्या मैं आपको अनु बोल सकता हूँ ?
हाँ क्यों नहीं ! मेरे सभी परिचित एवं मित्र मुझे अनु ही पुकारते हैं – अरुणिमा ने मुस्कुराकर कहा I
अनु मैं आपके लिए सिर्फ आपका परिचित अथवा मित्र नहीं बनना चाहता – बहुत साहस जुटा कर सुधांश कह सका था I
मैं आपकी बात का अर्थ नहीं समझी- अनु ने आश्चर्य से पूछा I
सुधांश – अनु मैं आपके लिए विशिष्ट बनना चाहता हूँ जैसे आप मेरे लिए औरों से अलग हैं I आशा करता हूँ अब आप मेरी बातों का अर्थ समझ गयी होंगी I
अरुणिमा के कपोलों पर लालिमा फैल गयी आँखें झुकाए वह अपने दुपट्टे का कोना अपनी उँगलियों पर लपेटने लगी I
अनु आपको असहज करने का मेरा इरादा बिलकुल नहीं था I यदि आपको बुरा लगा तो मैं क्षमा चाहता हूँ – कहते हुए सुधांश कार से बाहर आ कर अनु के सामने खड़ा हो गया I
-नहीं नहीं ! ऐसी कोई बात नहीं है आप कृपया क्षमा न माँगे I वो आपका प्रश्न अप्रत्याशित था ना ? इसलिए I
-तो क्या मैं अपने प्रश्न के उत्तर की अपेक्षा कर सकता हूँ ?
-मैं क्या उत्तर दूँ I ये तो आपको स्वयं समझना होगा I
मैं तो अपने हित के अनुरूप ही समझूँगा -सुधांश ने शरारत भरी मुस्कान के साथ कहा I
तो फिर वैसा ही समझिये – कहते हुए अनु मुस्कुराई और अपने घर की तरफ चल पड़ी I
सुधांश को अपने प्रश्न का उत्तर मिल चुका था और आज वह बहुत प्रसन्न था I
घर तक रास्ता कब कटा सुधांश को पता ही नहीं चला I घर पहुँचते ही वह सीधे सुधा के कमरे में गया और उसका हाथ पकड़ कर खुशी में लगभग चीखता हुआ बोला ” ओ सुधा , मेरी बहन ! आज मुझे मेरे प्रश्न का उत्तर मिल गया .. उसने हाँ कह दी सुधा …. आज मैं कितना प्रसन्न हूँ तुम्हें बता नहीं सकता ”
“ बताने की आवश्यकता भी नहीं है भाई I आपकी आवाज़ और आपका चेहरा भली प्रकार आपकी प्रसन्नता प्रतिबिंबित कर रहा है I मैं बहुत खुश हूँ जैसा आप चाहते थे अनु दी ने वैसा ही उत्तर दिया I”
अनु और सुधांश के लगभग रोज़ मिलने का सिलसिला प्रारंभ हो चुका था I सुधांश अनु को उसके घर के निकट तक अपनी कार में छोड़ आता फिर शेष दूरी अनु पैदल तय करती I इससे घरवालों को उनके प्रेम की भनक न लग सकी और बिना किसी बाधा के उनका सम्बन्ध प्रगाढ़ से प्रगाढ़तर होता चला गया I
सुधांश –“अनु तुम्हारी प्रसन्नता के लिए मैं कुछ भी करने को प्रस्तुत हूँ I तुम्हारे चेहरे की मुस्कान मुझे निहाल कर देने को पर्याप्त है I मैं तुम्हारी हर इच्छा पूरा कर देना चाहता हूँ पर अनु तुम कभी मुझसे कुछ कहो तो I”
“ मैं आपके समक्ष कोई फ़रमाइश इसलिए नहीं रखती क्योंकि मैं इस प्रकार की माँगों को अनुचित मानती हूँ यदि मैं आपसे प्रेम करती हूँ तो बिना किसी अपेक्षा के होना चाहिए I यदि प्रेम प्रतिदान माँगे तो फिर प्रेम कैसा ?”
“अनु तुम्हारा मेरे जीवन में प्रवेश मेरे लिए ईश्वर का सबसे सुन्दर वरदान है I अब कभी मुझसे दूर मत होना… मैं अब तुम्हारे बिना अपने जीवन का अस्तित्व सोच भी नहीं सकता” सुधांश अनुनय करता हुआ बोला I
“किसी को मेरी इतनी आवश्यकता है यह बात मुझे कहीं घमंडी ना बना दे I” अनु के चेहरे पर शरारत भरी मुस्कान थी I
इस प्रेम कहानी के दो राज़दार थे सुधा और अंजली I अनु अपने और सुधांश के बीच की बातें अंजली के साथ बाँटती थी और अंजली को भी इस सम्बन्ध से कोई आपत्ति नहीं थी Iवह जानती थी अनु ने जिसे जीवन साथी के रूप में चुना है वह सच में उससे बहुत अधिक प्रेम करता है I एक रिश्ते की मज़बूती व स्थायित्व के लिए और क्या चाहिए I अनु के घर तक का रास्ता अक्सर वह इन दोनों के साथ ही तय करती थी और इस दौरान सुधांश के स्वभाव का जो आँकलन उसने किया था उसके आधार पर वह निश्चित रूप से कह सकी थी कि सुधांश कभी अनु को धोख़ा नहीं देगा I इसलिए उसके भविष्य के प्रति वह निश्चिन्त थी और इस प्रेम कहानी के सुखद अंत को उत्सुक I
इधर कुछ दिनों से अनु उदास थी और सुधांश के पूछने पर वह घर की याद आने का बहाना बना कर बात टाल देती I पर वह जानता था कि कुछ बात तो अवश्य है जिसको अनु छिपा रही है I अतः उसने बात की तह तक जाने का निश्चय किया और अंजली से मिलने उसके हॉस्टल पहुँच गया I
सुधांश को अपने कमरे में देख कर अंजली चौंक पड़ी थी -अरे आप ..यहाँ कैसे आना हुआ सब कुशल तो है ?
हाँ ! हाँ! सब कुशल से है I अब चिंता
करना छोड़ो और मैं आपसे जो पूछने आया हूँ उसका आप बिलकुल सच- सच उत्तर देना I
“क्या बात है? किस बारे में जानना चाह रहे है आप?- अंजली ने प्रश्न किया I
“मैंने महसूस किया है कि आजकल अनु कुछ चिंतित रहती है और पूछने पर बात को बदल देती है I क्या आप बता सकतीं है कि उसकी चिंता का कारण क्या है ?”
“हाँ वह परेशान तो है पर कदाचित वह आपको बताना न चाह रही हो I फिर आप क्यों जानना चाह रहे हैं ?”
“क्योंकि उसका परेशान होना मुझे बेचैन कर रहा हैI यदि मैं उसकी कुछ सहायता कर सकूँ तो मुझे अच्छा लगेगा I वह तो कुछ बतायेगी नहीं पर आपसे तो आशा कर सकता हूँ ना ?”
“हाँ! दरअसल उसका बी0एड 0 के लिए चयन हो गया है I किन्तु उसके माता पिता लखनऊ जैसे बड़े शहर में उसके पढ़ने और हॉस्टल में रहने का खर्च उठाने में असमर्थ हैं I इसीलिये वह थोड़ी सी मायूस है क्योंकि वह शिक्षा के क्षेत्र में ही अपना करियर देखती है और इतना अच्छा मौक़ा हाथ से निकल रहा है I”
थैंक्स अंजली , तुमने मुझे इस ऊहापोह से निकाल लिया पर मुझे दुःख है कि अनु ने मुझे अपनी परेशानी का साझीदार बनने लायक नहीं समझा I खैर! अब मैं चलता हूँ I नमस्कार कहते हुए सुधांश कमरे से बाहर चला आया I
“आपने गलत समझा है मुझे ,मैं… मैं आपको अपना दुःख बाँटने लायक नहीं समझूँगी ऐसा कैसे सोच लिया आपने ?”
“तो फिर रोज़ रोज़ बात क्यूँ टालती रही तुम अनु , कुछ बताओगी मुझे ?”
“आपको कष्ट नहीं देना चाहती थी I ”
“या कहो कि मेरी सहायता नहीं लेना चाहती थी I है ना ?”
“नहीं .. नहीं .. ऐसा बिलकुल नहीं है I मेरा विश्वास कीजिये I ”
“ठीक है I पर मेरी एक शर्त है कि तुम्हारी पढ़ाई का पूरा खर्च मैं उठाऊँगा और तुम इनकार नहीं करोगी I यदि स्वीकार है तो मैं भी तुम पर विश्वास करने को तैयार हूँ I ”
“पर मैं …कैसे… आपसे”
“प्लीज़ इनकार मत करो I अनु मुझे पराया बनाने में क्या आनंद मिलता है तुम्हें?”
“ऐसा न कहिये I ज़रा सोचिये मैं अपने पिताजी से क्या कहूँगी I”

“कह देना कि अंजली तुम्हारी सहायता कर रही है I”
“ठीक है ! जैसा आप कहें किन्तु याद रहे मुझे लखनऊ जाना पड़ेगा I”
“ कोई बात नहीं I तुम्हारा स्वप्न साकार हो जाए इसके लिए मैं कुछ वक़्त की दूरी सहने के लिए भी तैयार हूँ I और फिर लखनऊ यहाँ से है ही कितना दूर जब मन किया बस पहुँच गए I – सुधांश ने अनु का हाथ अपने हाथों में थामते हुए स्नेह भरी दृष्टि से उसकी और देखते हुए कहा I हालांकि उसकी आँखों से उदासी साफ़ झलक रही थी I
और फिर वह दिन आ गया जब अनु लखनऊ चली गयी I सुधांश भारी मन से उसे विदा कर के सीधे घर वापस आया और अपने कमरे में रखी आराम कुर्सी में धँस गया I सुधा ने उसे आते हुए देख लिया था I अतः वह उसके पीछे पीछे उसके कमरे में आ गयी I सुधांश को उदास देख कर उसने उसके कंधे पर जैसे ही हाथ रखा वह फफक पड़ा I
सुधा – क्या हुआ भाई ऐसे क्यों रो रहे हैं ?बहुत बुरा लग रहा है ना अनु दी के जाने का I पर भाई यह फैसला भी तो आपका ही था कि उन्हें जाना चाहिए I
“हाँ सुधा , मेरा फैसला था I वास्तव में मैं चाहता भी हूँ कि वह अपनी मंजिल को पाए I पर मेरी उदासी भी तो अपनी जगह वाजिब है ना?”
“बिलकुल वाजिब है भाई I पर ऐसे दुखी रहेंगे तो अपने काम पर कैसे ध्यान देंगे I अगर अनु दी अपनी मंजिल पाने के लिए गयी हैं तो आप भी तो अपने बिजनेस को आगे बढाने के लिए प्रयास कीजिये I आपका ध्यान भी बँट जाएगा और वक़्त का सदुपयोग भी होगा I और जब मन करे दी से मिलने चले जाइएगा औरहो सके तो एक आध बारमुझे भी उनसे मिलवा लाइयेगा I क्यों ले जाएंगे ना? या हर बार अकेले चुपचाप ही मिल आयेंगे I सच भाई ! मैं भी उस दिन की बड़ी बेसब्री से प्रतीक्षा कर रही हूँ जब अनु दी का बी 0 एड0 पूरा हो जाएगाऔरआप उनके घर जाकर उनका हाथ माँगेंगे और वे मेरी भाभी बन जायेंगी” – सुधा सामने की ओर से आकर सुधांश के पैरो के पास बैठते हुए बोली I उसके होंठों पर फैली हुई मुस्कराहट देखकर सुधांश का मन भी हल्का हो गया I
अरुणिमा का बी0 एड0 कोर्स और सुधांश से उसका प्रेम दोनों निर्विघ्न आगे बढ़ रहे थे I कभी सुधांश अकेला तो कभी सुधा के संग अनु से मिलाने जाता I पूरा दिन वे संग बिताते और शाम के वक़्त अनु को हॉस्टल छोड़कर वे लोग वापस घर की ओर लौट जाते I
अंजली भी अपना कॉलेज पूरा कर अपने शहर वापस लौट चुकी थी I पर वह और अनु पत्रों के माध्यम से संपर्क बनाये हुए थे I अनु नए शहर के अपने समस्त कार्यकलाप अंजली के साथ बाँटती और अंजली अपने शहर की हर खबर I सुधांश कब कब अनु से मिलने आया उनके बीच क्या बातें हुई सब अंजली को पता था I हाँ ! सुधांश के लिए ‘स्वर्णा’ शब्द का प्रयोग किया जाता जिससे ऐसा प्रतीत होता मानो वह उनकी कोई सहेली है I
उस ख़त को पढ़कर सुधांश के पैरों तले ज़मीन सरक गयी I उस अनजाने पत्र में लिखा था कि उसके और अनु के सम्बन्ध के विषय में भनक लगते ही अनु के घरवालों ने अफरा तफरी में उसकी शादी कर दी है I इस शुक्रवार को वह अपना सामान लेने आख़िरी बार लखनऊ आ रही है Iयदि वह उससे अंतिम बार मिलना चाहता है तो आ जाए I
वह लेख अनु का तो नहीं था फिर किसने लिखा है यह और क्यों ? क्या सच में … नहीं ..नहीं वे लोग हमारे साथ ऐसा कभी नहीं करेंगे अगर यह सच हुआ तो? हे ईश्वर! अनु के बगैर मैं कैसे ज़िंदा रहूंगा और अनु.. वह बेचारी तो जीते जी मर जायेगी I यह अचानक क्या हो गया ..मेरे भगवान.. हमारे साथ ऐसा अन्याय मत करना I मैं क्या करूँगा उसके बिना … क्या करूँ …कहाँ जाऊँ… सुधा …हाँ .. सुधा से बात करता हूँ वही कुछ रास्ता बताएगी – सोचते हुए सुधांश उसके कमरे के तरफ बढ़ा I
सुधा अपने कमरे मैं बैठी पढ़ रही थी बदहवास से सुधांश को देख कर वह घबरा उठी -क्या हुआ भाई .. ऐसी हालत क्यूँ बना रखी है I इतने बदहवास से क्यूँ हैं ? ऐसे ही खड़े रहेंगे या कुछ कहेंगे I प्लीज़ कुछ कहिये मेरा दिल बैठा जा रहा है I क्या बात है .. आप सुन रहे है ?
‘अनु की शादी हो गयी सुधा Iअब मैं क्या करूँ.. मैं बर्बाद हो गया.. वे लोग मेरे साथ ऐसा कैसे कर सकते हैं?’
सुधा – ‘क्या बात कर रहे है, किसने कहा आपसे?
‘यह पत्र देखो I किसी अनजान व्यक्ति ने भेजा है’- वह रो पड़ा था I
सुधांश के हाथ से पत्र लेकर सुधा पढ़ने लगी -(ख़त पढ़ने के बाद ) ऐसा कैसे हो गया I उसकी आँखे आँसुओं से भर गयी पर सुधांश कमजोर पड़ जाएगा इस डर से उसने तुरंत अपने आँसू पोछ लिए और सामान्य बनने का उपक्रम करते हुए बोली – अरे ,किसी ने मजाक किया होगा आपके साथ I ऐसा कीजिये एक बार स्वयं जा कर देख आईये I सत्य क्या है पता चल जाएगा किन्तु तब तक धैर्य बनाए रखिये I क्या जाने यह सब झूठ हो I
‘ठीक है,मैं अभी रवाना होता हूँ I माँ पिताजी से कहना कि बहुत ही आवश्यक था इसलिए बिना बताये जाना पड़ा I
‘मैं कह दूँगी ,अब आप तुरंत जाईये I
सुधांश ने गाड़ी निकलवाई और लखनऊ के लिए रवाना हो गया I और जब वह अनु के घर के बाहर पहुँचा तो देखा कि घर के द्वार अधखुले थे अर्थात कोई घर में था Iसुधांश ने तेजी से घर में प्रवेश किया तो पाया अनु खाना पका रही थी I सुधांश को अचानक इस तरह आता देख कर वह चौंक पड़ी -क्या हुआ आप अचानक इतनी रात को इस तरह और आपकी आँखें इतनी लाल और सूजी हुई क्यों है (सुधांश के करीब आते हुए ) कुछ हुआ है क्या ?
यह ख़त पढ़ो I जानती हो किसने लिखा है -उसने पत्र अनु की तरफ बढाया I
अनु ने वह पत्र लपक कर लिया और पड़ने लगी -(पढ़ने के बाद ) यह क्या बकवास लिखी है ऐसा तो कुछ हुआ ही नहीं है I
और हो जाता तो मुझे जीवित न पाती तुम सत्य कहता हूँ- सुधांश की आँखे आंसुओं से डबडबा गयीं I
तो इसलिए आपकी आँखें लाल हो रही थीं I रोए थे ना ?- अनु सुधांश के आँसू पोछते हुए बोली I
रोने की बात कहती हो मैं अपने होशोहवास खो बैठा था Iअनु तुमसे अलग होने का ख़याल ही मुझे तोड़ डालने के लिए काफी है I(अनु का हाथ थाम कर ) वादा करो तुम कभी मुझे धोखा नहीं दोगी I कभी छोड़ कर नहीं जाओगी I वादा करो अनु, वादा करो आज मुझसे I
अरुणिमा – मैं नहीं जानती कि ईश्वर ने हमारे लिए क्या सोचा है I उनकी मर्जी के आगे तो मेरा कोई सामर्थ्य नहीं है I किन्तु जब तक जिन्दगी मेरे बस में है मैं आपसे अलग अपने अस्तित्व के विषय में सोच भी नहीं सकती I
“किन्तु मैं अब निश्चिन्त होना चाहता हूँ I मैं शीघ्र ही तुम्हारे घर जा कर तुम्हारे परिवारजनों के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखना चाहता हूँ I”
“लेकिन अभी तो मेरा कोर्स …”
“कोई बात नहीं वह तो विवाह के बाद भी पूरा किया जा सकता है I मैं तुम्हें रोकूंगा थोड़े ही I”
“किन्तु मैं डरती हूँ I”
किस बात से ?
“उन्होंने इनकार कर दिया तो ?”
क्यों इनकार करेंगे ? मैं एक प्रतिष्ठित परिवार से सम्बन्ध रखता हूँ , धनवान हूँ, और सबसे बड़ी बात यह कि तुम्हें बहुत खुश भी रखूँगा I क्या यह हाँ कहने के लिए पर्याप्त नहीं हैं?
“पर हमारी जाति ..वह तो एक नहीं है और मैं जानती हूँ कि यह बहुत बड़ा मुद्दा है”
“तो तुम क्या चाहती हो कहो I”
“मैं चाहती हूँ कि हम चुपचाप विवाह कर लें फिर कोई अड़चन नहीं आ सकेगी I अच्छा …क्या आपके घरवाले सहमत हैं वह तो हमारा साथ देंगे ना ?”
सुधांश – उनकी ओर से कोई बाधा नहीं आयेगी लेकिन यह अनुचित होगा I मैं विवाह जैसे बंधन के लिए दोनों पक्षों की सहमति एवं आशीर्वाद आवश्यक समझता हूँI ऐसा करते है तुम कल ही श्यामपुर के लिए रवाना हो जाओ और मैं एक दो दिनों में आकर उनसे बात करता हूँ I तब तक तुम अपनी माताजी को सब कुछ बताकर विश्वास में लो जिससे हमारी राह कुछ आसान हो सके I
अनु – आपको लगता है यह सब इतना सरल होगा ? नहीं सुधांश .. यह बहुत दुष्कर है I मेरे परिवार को सहमत करना बहुत टेड़ी खीर होगा और यदि वे न माने तो फिर हम क्या करेंगे I
“तो फिर जैसा तुम कहोगी वैसा ही होगा I पर पहले जो मैं कहता हूँ वह करो”
“ठीक है जैसा आप चाहें I अच्छा तो फिर मै कल ही चले जाती हूँ I”
अब मैं घर वापस जाता हूँ I माँ भी चिंता करती होंगी बिना बताये भाग आया था I केवल सुधा को पता है इस बात का -सुधांश ने उससे विदा ली I
कृपया ईश्वर से हमारे लिए प्रार्थना कीजिएगा- अनु ने विदा करते हुए कहा I
सुधांश मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गया I
ये क्या किया अनु तूने ? तू जानती है इसका परिणाम क्या होगा -माँ गंभीर मुद्रा में थीं I
“मैं क्या करूँ माँ ..मैं उनके बिना कभी सुखी नहीं रह सकूँगी और … और उनका क्या होगा ?”
“यह सब पहले सोचना चाहिए था I क्या तू अपने बाबूजी को जानती नहीं”
“मेरी सहायता करो माँ I प्लीज़ बाबूजी को इस रिश्ते के लिए मना लो I सुधांश बहुत खुश रखेंगे मुझेI
मैं बात करके देखती हूँ शेष तेरा भाग्य- कहते हुए माँ उठी और कमरे से बाहर चली गईं I
अनु घुटनों में सिर को छिपा कर रोने लगी I उसे भविष्य में होने वाली अनहोनी स्पष्ट दिखाई दे रही थी I आज उसे इस बात के लिए बेहद पश्चाताप और दुःख हो रहा था कि आखिर उसने सुधांश की बात मानी ही क्यों I
“माँ… मैं तैयार हो रही हूँ” कहते हुए कमरे का दरवाजा बंद करके अरुणिमा शीघ्रता से लिखने बैठ गयी I

प्रिय अंजली ,
आज बहुत कठिनाई से थोड़ा एकांत ढूँढ सकी हूँ इसलिए तुम्हें पत्र लिखने का अवसर मिला है I जानती हो स्वर्णा यहाँ घर पर आयी थी I वह बहुत रोई थी पर विष्णु दादा और सुहास दादा ने उसे मुझसे मिलने तक नहीं दिया I अंतिम बार उसकी एक झलक भी ना देख सकी I श्री ओमप्रकाश शर्मा जी के साथ आज मेरा विवाह सम्पन्न होने जा रहा है I वे इलाहाबाद के प्रतिष्ठित वकील हैI बहुत अमीर परिवार से हैं पर मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मुझे आजीवन कारावास का दंड मिलने जा रहा है I औरमुझे इस दंड को प्रसन्न ह्रदय से स्वीकार भी करना होगा I किन्तु चिंता तो स्वर्णा की है I उसका क्या होगा वह कैसे जी सकेगी I यदि उससे मिलो तो कहना उसके आदर्शों ने हमारे जीवन के रास्ते इस तरह अलग – अलग कर दिए हैं जो अब इस जीवन यात्रा में किसी भी चौराहे पर कभी भी नहीं मिलेंगे I एक शिकायत तुमसे भी हैI वह यह कि तुम्हारे एक मजाक ने हमारा भविष्य की दिशा बदल दी I
तुम्हारी

अनु
अनु ने पत्र लपेटकर लिफ़ाफ़े में बंद किया और पता लिखकर अपने कमरे की खिड़की खोल कर बाहर झाँकाI सड़क पर खेलते एक बच्चे को इशारा करके निकट बुलाया औरउसे लिफाफ थमाकर सड़क के किनारे बने पोस्ट बॉक्स में डालने को कहा I तभी उसके कमरे का द्वार किसी ने जोर से खटखटाया I सहमी हुई अनु ने घबराकर पीछे की तरफ देखा तो वहाँ ओमप्रकाश को खड़ा पायाI उन्हें देख अरुणिमा चौंक कर अतीत के गलियारों से बाहर निकल आयी I
“क्या बात है कहाँ खो गयी- कहते हुए वे भीतर आ गए थे I
“कुछ नहीं I बस हमारे विवाह का दिन याद आ गया”
अरे! तुम्हारे हाथ में क्या है ? ये लिफाफा ..फिर वही गुमनाम शुभकामना सन्देशI
हाँ I यह कभी दिन नहीं भूलता I आज बाईस वर्ष हो गए पर एक भी ऐसी वर्षगाँठ नहीं हुई जब यह सन्देश न आया हो I
ओम ने अनु की गर्दन के चारों ओर अपनी बाँहों का घेरा बनाया और उसके कंधे पर अपनी ठोडी टिकाते हुए बोले – कहीं ऐसा तो नहीं कि कोई तुम्हें बहुत चाहता था I पर इससे पहले कि वह तुम्हारे समक्ष प्रस्ताव रख पता तुम्हारा विवाह मुझसे हो गया I
खिड़की से बाहर क्षितिज में दृष्टि जमाए हुए अनु ने उत्तर दिया -क्या पता ऐसा भी हो ,ना जाने कौन है I किन्तु ह्रदय में बहुत गहरी टीस उठी जिसकी प्रतिक्रिया में असहनीय पीड़ा की तीव्र लहर सारे शरीर में दौड़ गयी और अंतर्मन में एक ध्वनि गूँजी ‘स्वर्णा ‘I

         

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