ज़मीर जिंदा है

—-जमीर जिन्दा है—-

शर्मा जी जब भी दफ्तर में जाते डिप्टी डायरेक्टर से लेकर हैड़ क्लर्क, क्लर्क तक छोटे बड़े सब एक कतार में बैठे नजर आते। क्लर्क से बात करते तो वह हैड़ क्लर्क पर और हैड़ क्लर्क से करते तो वह डिप्टी डायरेक्टर पर टाल देता और डिप्टी डायरेक्टर के पास जाते तो साहेब बोल देते ” भाई शर्मा जी मेरे पास तो अभी तुम्हारी पैंशन के कागज़ नहीं आये हैं, आयेंगे तो मैं साइन कर दुंगा। मेरी तरफ से तो कोई ढ़ील नहीं है।” वो रुआंसे हो लौट जाते।
शर्मा जी को रिटायर हुए कई माह हो गये थे, और उतने ही विभाग के दफ्तर में चक्कर लगाते हुए, थक चुके थे। सरकारी विभाग या प्राइवेट की ही बात नहीं बल्कि पूरे समाज की है। छोटी से लेकर बड़ी इकाई तक खाल नोचने को कतार लगाये बैठे हैं। हालात से परेशान असहाय इंसान अपनी खुदी को, अपने ज़मीर को मार अपने काम निकलवाने के लिए जमीन पर ढ़ह जाता है और कुर्सी पर बैठे गिद्ध मांस नोचने को टूट पड़ते हैं ऐसे मुर्दों पर।
जिंदगी भर कभी रिश्र्वत न लेने-देने वाले शर्मा जी ने भी आज निश्चय कर लिया था कि आज वो काम करवा कर ही रहेंगे। सीधे डिप्टी डायरेक्टर के पास ही गये ” मिड्ढा साहेब! आज मुझे अपना काम पूरा चाहिए, उसके बिना आज मैं वापिस नहीं जाऊंगा।”
मिड्ढा साहेब क्लर्क व हैडकलर्क की तरफ एक आँख दबा कर बोले ” अरे चोपड़ा, अरे श्रीभगवान! आज शर्मा जी का काम पूरा करो भाई।कह रहे हैं मैं काम पूरा करवा कर ही जाऊंगा।” शर्मा जी ने आँख दबाते हुए देख लिया था फिर भी स्वयं को संयत कर कलर्क की तरफ बढ़ गये।वह बोला ” शर्मा जी! क्यों दुखी हो रहे हो? कुछ जेब ढीली करो, मुफ्त में ही माल चाहते हो।” शर्मा जी का संयम जवाब दे चुका था। भृकुटी टेढ़ी हो गई। ” क्यों? मुफ्त का माल कैसे हैं? सा‌ठ साल तक ईमानदारी से विभाग की सेवा की है। तुम्हें तनख़ाह मिलती है, कोई फ्री में काम नहीं करते हो।पेट नहीं भरता है तो हाथ में कटोरा ले लो और चौराहे पर खड़े होकर भीख़ मांगो। दफ्तर वालों को शान्त, हंसमुख प्रकृति वाले शर्मा जी से ऐसी आशा नहीं थी। सब सहम से गये। विभाग व समाज में शर्मा जी का सम्मान था सो दफ्तर वाले चुप रह बगलें झांकने लगे। वो क्रोध में बोले जा रहे थे ” मैं रिटायर हो चुका हूं, कुछ काम तो है नहीं, मैं भी यहीं बैठा हूं, जो भी आयेगा सब से कहुंगा कि यहां भिखमंगे बैठे हैं, लोगों! इन्हें भीख देते जाओ।” दफ्तर के दरवाज़े पर कुर्सी लेकर बैठ गये
अंदर कुछ कानाफूसी हुई, चोपड़ा शर्मा जी के सामने करबद्ध आकर खड़ा हो गया। ” शर्मा जी आपका काम पूरा हो गया है।” काम तो पहले ही पूरा था परन्तु रोक रखा था लालच में।शर्मा जी का ज़मीर जिंदा रहा वो जान और माल बचा कर चले गए। विभाग के टहने पर के गिद्ध मुंह लटकाते बैठे थे शायद कोई और ही मुर्दा फंस जाये।
—– राजश्री—–

         

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