परीक्षा

परीक्षा ( कहानी )
ले० – डॉ. रंजना वर्मा

“जगन्नाथ भाई ! अरे ओ जगन्नाथ भाई !” साहूकार दिगंबर ने द्वार पर आ कर पुकारा ।
जगन्नाथ उसकी दुकान से तीन महीने पहले दो रुपये उधार लाया था । ब्याज सहित कुल मिलाकर ढाई रुपए हो चुके थे लेकिन मूल की कौन कहे जगन्नाथ सूद तक देने नहीं आया आज तक । वह धन डूब न जाए इसीलिए वह आज स्वयं उसके घर आया था ।
साहूकार की आवाज सुनकर जगन्नाथ घबरा गया । घर में भूजी भांग भी न थी । दो दिन से घर में चूल्हा तक न जला था । क्या करे कुछ समझ में नहीं आ रहा था । पत्नी पार्वती से पानी भेजने के लिए कह कर वह बाहर निकला ।
“आओ आओ भाई ! बैठो ।” उसने जल्दी से दरवाजे के बाहर खाट बिछा दी । जगन्नाथ की सज्जनता से प्रभावित होते हुए वह बोला –
“बहुत दिनों से तुमसे मुलाकात नहीं हुई । आज इधर से मैं जा रहा था तो सोचा तुम्हें याद दिलाता चलूँ ।”
तभी जगन्नाथ की आठ वर्षीया पुत्री लोटे में पानी लेकर बाहर आई ।
“बापू ! पानी ।” लोटा पिता के हाथों में थमा कर वह खड़ी हो गई ।
इस छोटी सी आयु में ही उसका रूप सौंदर्य निखरा पड़ता था । बड़ी बड़ी चंचल आंखें अनायास ही मन को आकृष्ट कर लेती थी । वाणी क्या थी उसके उसके मुख से जैसे अमृत की बूंदें झर रही थी । दिगंबर उसकी ओर एकटक देखता रह गया । उसकी उस दृष्टि से घबराकर मदिरा अंदर चली गई ।
“यह आपकी लड़की है ?” दिगम्बर ने पूछा ।
“हां भाई । यही एक बोझ है । सयानी हो गई है । न जाने भगवान कब सुनेंगे ।” जगन्नाथ ने एक गहरी सांस ली ।
“अच्छा चलता हूं मैं ।” थोड़ी देर बाद दिगंबर ने कहा और उठ कर अपने घर की ओर चल पड़ा ।
जगन्नाथ की विपन्नता से उसे सहानुभूति न थी किंतु मदिरा के सौंदर्य ने उसे कुछ सोचने के लिए विवश कर दिया था । उस समय उसकी आयु पचास वर्ष पार कर रही थी । पत्नी का स्वर्गवास दस वर्ष पूर्व ही हो चुका था । एक पुत्र था जो अपनी पत्नी बच्चों के साथ अलग घर में रहता था । मदिरा को देखकर उसके हृदय में चाह जाग उठी और उस काल के समाज में ऐसी चाह जाग उठना अस्वाभाविक भी न था ।
वह सम्राट अकबर का शासन काल था । साम्राज्य में उसके नवरत्नों की तूती बोलती थी । अक्सर युद्ध होते रहते थे जिस कारण अधिकांश युवा पुरुष सेना में भर्ती हो जाते थे और युद्ध में मारे जाते थे । इसलिए समाज में युवकों की कमी थी ।कन्याओं का विवाह अधिक आयु के पुरुषों से कर देना उन दिनों आम बात थी ।
हिंदू समाज कट्टर धार्मिक अंधविश्वासों में जकड़ा हुआ था । धर्म ग्रंथों के अनुसार रजस्वला होने से पूर्व कन्या का विवाह न कर देने वाले माता-पिता रौरव नरक के भागी होते थे । उससे बचने के लिए वृद्धों को भी कन्यादान करके मनुष्य स्वयं को मुक्त समझता था । यहां तक कि वर न पाने की स्थिति में कन्या का विवाह वट वृक्ष अथवा तुलसी वृक्ष से कर देने की प्रथा भी प्रचलित थी । बहुधा भगवान की मूर्ति के साथ भी कन्या का विवाह कर दिया जाता था और उसे उसके भाग्य के भरोसे जीने के लिए घर से विदा कर दिया जाता था । इस प्रकार की अधिकांश कन्याओं को मुगल सैनिक अधिकारी आदि अपने घरों में दासी बनाकर रख लेते थे । या फिर वह रूप हाट में बिकने के लिए पहुंच जाती थी । कुछ धर्म प्राण बालिकाएं यमुना जी में जल समाधि ले लेती थी ।
दिगंबर ने जब अपने सेवक को पंडित के साथ जगन्नाथ के घर भेज कर अपनी इच्छा प्रकट की तो वह प्रसन्न ही हुआ । विवाह के खर्च के लिए दिगंबर ने वस्त्रों आभूषणों के अलावा नगद सौ रुपये भी भिजवा दिए और विवाह धूमधाम से करने का निर्देश भी दिया । जगन्नाथ की धर्म में अटूट आस्था थी । वह कन्या के धन को अस्पृश्य समझता था । निर्धन होते हुए भी उसने दिगंबर से प्राप्त सारा धन विवाह में खर्च कर दिया ।
पत्नी को उदास देखकर उसने समझाया –
“क्यों दुखी होती हो पार्वती ! अरे हमारा तो यह सौभाग्य ही रहा कि जमाई ने घर बैठे बेटी का हाथ मांग लिया । हम दोनों समय खाना खा ही नहीं पाते उसके हाथ कैसे पीले कर पाते ।”
“लेकिन उसकी आयु …” पार्वती ने कुछ कहना चाहा ।
“आयु की बात न करो पार्वती ! हमारी मदिरा तो बहुतों से अच्छी है ,भाग्यवती है । यही क्या कम है कि उसे भगवान से या वृक्ष से विवाह नहीं करना पड़ा । उसे सौतों पर नहीं भेजना पड़ा । अरे अच्छा खासा खाता पीता घर है । सुखी रहेगी । जो चाहेगी अच्छा खाएगी पिएगी तो चार दिन में देह भर जाएगी । हमने उसे अच्छे संस्कार दिए हैं । पति की गृहस्थी संभाल लेगी । तुम चिंता मत करो । वहां उसे दोनों जून खाने को तो भरपेट मिलेगा न । उसके सुख के सिवाय हमें और क्या चाहिए ?”
पार्वती कुछ कह न सकी । घर परिवार पास पड़ोस सभी प्रसन्न थे । सहेलियां मदिरा के भाग्य से ईर्ष्या कर रही थी । उन आभूषणों और रेशमी वस्त्रों में वह पूरी महारानी लग रही थी । मदिरा भी नए-नए वस्त्र और आभूषण पाकर प्रसन्न थी । ऐसे गहने कपड़े तो उसने सपने में भी नहीं देखे थे । विदा होकर मदिरा ससुराल पहुंची तो वहां का वैभव देखकर चकित रह गई । महल जैसा घर , दास दासियाँ , वहां की संपन्नता देखकर प्रसन्नता से वह नाच उठी ।
दिगम्बर उस पर प्राण छिड़कता था । नन्ही सी लड़की ब्याह शादी का अर्थ पहनना ओढ़ना ही जानती थी । वैभव में पड़ कर उसका रंग रूप और अधिक निखर आया । कुछ ही दिनों में उसकी दुबली देह भर गई और भरपूर यौवन खिल उठा उस पर । उसके अंग अंग में यौवन की लुनाई छा गई । आंखों से मद बरसने लगा । आयु के पन्द्रह वर्ष पूरे करते करते वह पूर्ण रूप से अपने नाम को सार्थक करने लगी ।
दिगंबर उसके इस रूप सौंदर्य का पुजारी बन गया था । वह उसे ढंग ढंग से सजा सँवार कर सामने बैठाकर उसका रूप निहारा करता । उसके एक संकेत पर संसार भर के सुख उसके चरणों पर न्योछावर कर देना चाहता परंतु युवावस्था की देहरी पर खड़ी मदिरा को जिस सुख की चाह थी वह देना उसके लिए संभव न था । मदिरा भी अब विवाह का अर्थ समझने लगी थी । वह समझने लगी थी कि विवाह का अर्थ केवल वही नहीं होता जो इसे सहज रुप से प्राप्त हो रहा है । इसके लिए वह किसी को दोष भी नहीं दे सकती थी । उसके चारों ओर ऐसा ही हाहाकार , ऐसी ही अपूर्णता बिखरी हुई थी ।
उस समय अब्दुल रहीम खानखाना अकबर के विशेष कृपा पात्रों मे थे । उनकी उदारता और सहृदयता की अनेक कहानियां जनसाधारण में प्रचलित थी । अमूल्य प्रतिभा के साथ साथ अद्भुत सौंदर्य तथा पुरुषोचित बलिष्ठता के स्वामी रहीम ने लोगों के हृदय पर अधिकार कर रखा था । रहीम की सवारी निकलने की सूचना पाकर उस दिन मदिरा भी अपने भवन के ऊपरी प्रकोष्ठ में जाकर झरोखे में खड़ी हो गई ।
राज मार्ग के दोनों ओर जनता कतारों में खड़ी थी । तभी घुड़सवारों का एक छोटा काफिला आता दिखाई दिया । अंगरक्षक आगे आगे चल रहे थे । उनके ऊंचे पुष्ट घोड़े मानो आकाश पर पांव रखने के लिए आतुर हो रहे थे । उनके पीछे था एक सुंदर रथ जिस पर लगी सोने की पत्तरों पर पच्चीकारी की गई थी । विशाल रथ पर आगे सारथी और उसके पीछे ऊंचे रत्नजटित छत्र के नीचे रेशमी गद्देदार आसन पर बैठा था एक सजीला युवक जिसके मुख मंडल से दृढ़ता , वीरता और ओज की किरनें फूटी रही थी । उसके पुष्ट अंगों से जैसे बल पौरुष फूटा पड़ता था । सुंदर चेहरा , उन्नत नासिका , चौड़ा ललाट और कंधों तक लहराते काले घुंघराले केशों के ऊपर करीने से लगी कलँगीदार पगड़ी जिस पर सामने की ओर छोटी सी जड़ाऊ सिरमौर लगी हुई थी । कमर में रत्नजटित म्यान में तलवार रखी थी जिसकी मूठ पर जड़े हीरे दूर से ही चमक रहे थे ।कुल मिलाकर प्याजी रंग के परिधान में सजा वह युवक दर्शनीय था । मस्तक पर बना एक बड़ा सा घाव का निशान उसकी युद्ध कुशलता का संकेत दे रहा था । वही था रहीम नाम का युवक जिसे शहंशाह अकबर ने अब्दुल रहीम खानखाना का नाम दिया था ।
मदिरा की दृष्टि उस युवक पर चिपक कर रह गई । पुरुषों में भी ऐसा अद्भुत आकर्षण , ऐसा अदभुत सौंदर्य हो सकता है इसका ज्ञान उसे जैसे पहली बार हुआ था । वह उसे अनिमेष देख रही थी तभी तीव्र कोलाहल उठने लगा । भीड़ में से किसी ने एक पंचसेरा ( पांच से वजन का बाट ) रहीम पर खींच कर मार दिया । निशाना चूक जाने अथवा रथ के गतिशील रहने के कारण बाट रहीम को न लगकर उसके पीठासन से टकराकर गिर पड़ा । रहीम चोट खाने से बाल-बाल बचे थे । पकड़ो पकड़ो का शोर उठने लगा । अंग रक्षकों की टुकड़ी दौड़ पड़ी और एक दीन हीन , काँपते हुए व्यक्ति को रहीम के सामने लाकर खड़ा कर दिया ।
“यही है । यही है वह व्यक्ति जिसने सरदार खानखाना साहब को मारने की कोशिश की थी ।”
रहीम ने नजर भर कर उस व्यक्ति को देखा और फिर अप्रत्याशित रूप से कहा –
“करीम ! इस गरीब को इस बाट के बराबर तोल कर सोना मेरे खजाने से दे दो ।”
“क्या कह रहे हैं हुजूर ?” करीम ने आश्चर्यचकित होकर पूछा ।
“इस ने आप को मारने की कोशिश की और आप इसे इनाम दे रहे हैं ?”
रहीम हँस पड़े ।
“नहीं भाई करीम ! इसने मुझे मारा नहीं था । मारना होता तो यह मुझे पत्थर मारता । लेकिन बहुत नादान है यह । मुझे पारस समझ कर इसने लोहे का पनसेरा फेंका जिससे मुझे छूकर वह सोना हो जाये । इस नादान का भ्रम मत तोड़ो । गरीबी सबसे बड़ा शाप है । पेट भरा हो तभी विवेक भी बना रहता है । पेट खाली हो तो कानून या धर्म-कर्म नहीं सुहाता किसी को ।”
रहीम का आदेश पाकर करीम चला गया । जनसमूह रहीम की जय जयकार करने लगा । उस दरिद्र अपराधी की आंखें छलछला उठीं । स्तब्ध खड़ी मदिरा के अंतस्थल में उस महान विभूति की मूर्ति आंखों के रास्ते धीरे धीरे उतर कर प्रतिस्थापित हो गयी । जब उसने आंखें खोली तब तक रहीम की सवारी जा चुकी थी ।
रहीम की सवारी चली गई परंतु मदिरा उसे भूल नहीं सकी। मन ही मन वह उससे मिलने के लिए व्याकुल रहने लगी । किसी की परवाह न करने वाले , युद्ध भूमि में अनुपम शौर्य दिखाने वाले रहीम से मिलने के लिए मदिरा अधीर रहने लगी
एक दिन दिगंबर शैया पर लेटा हुआ था । मदिरा कक्ष के झरोखे पर खड़ी होकर दूर पर बहती जमुना की पतली धारा को देख रही थी कि अनायास ही पति के स्वर ने उसका ध्यान तोड़ दिया । वह बड़े मीठे स्वर में रस ले ले कर गा रहा था –
“रहिमन प्रीति सराहिये , मिले होत रंग दून ।
ज्यों हरदी जरदी तजै , तजै सफेदी चून ।।”
दिगंबर इतना अच्छा गायक है , उसके कंठ में इतना माधुर्य है यह मदिरा ने उसी दिन जाना । उसे सबसे अधिक कवि के नाम ने आकृष्ट किया । तो क्या यह रहीम की रचना है ? मंथर गति से चल कर वह पति के सिरहाने पलंग पर बैठ कर उसका माथा सहलाने लगी । दिगंबर ने आंखें खोल दी ।
मधुर स्वर में वह बोली –
“बहुत अच्छा गाते हैं आप । किसकी रचना है यह ?”
“तुम नहीं जानती ? यह तो रहीम साहब का दोहा है . वही बादशाह हुजूर के नवरत्नों में शामिल अब्दुल रहीम खानखाना । बहुत अच्छा लिखते हैं वाह क्या बात है ।”
और उत्साह में भरकर दिगंबर ने दो चार दोहे और गा कर सुना दिए । इस कवि को कभी बुलवाइये न । कितना अच्छा लिखते हैं ।” मदिरा ने आग्रह करके कहा ।
” लिखती तो तुम भी बहुत अच्छा हो मदिरा । जो माधुरी तुम्हारी रचना में है वह रहीम की रचना में कहां ?”
दिगंबर ने उसे प्रेम भरी दृष्टि से देखते हुए कहा ।
“नहीं स्वामी , मैं गीत भले ही लिख दूं लेकिन वे दो पंक्तियों में , दोहे जैसे छोटे से छंद में जितने भाव भर देते हैं वह मेरे बस की बात नहीं । मुझे तो यही एक बात लिखने के लिए शायद पूरा गीत रचना पड़ेगा । बुलवाइये न कभी उन्हें ।”
“तुम कहती हो तो जरूर बुलाऊंगा उन्हें एक दिन ।” मदिरा की इस आग्रह भरी मनुहार से प्रसन्न होकर दिगंबर ने वादा किया ।
और एक दिन साहूकार घर पर रहीम को आमंत्रित करने का साहस भी कर बैठा । रहीम ने आमंत्रण स्वीकार कर लिया ।
मदिरा ने बड़े मनोयोग से अतिथिगृह को सजाया । रात देर तक वह पति तथा कुछ प्रमुख व्यक्तियों के साथ बैठे रहीम को पर्दे के पीछे से देखती और उनकी रचनाओं को सुनती रही । दिगंबर के कहने और रहीम के भी अनुरोध करने पर उसने अपना एक गीत अपने मधुर स्वर में गाकर सुनाया जिसे सुनकर रहीम ने दिल खोलकर प्रशंसा की । मदिरा की कविता और सहृदयता से प्रसन्न होकर वह अब कभी कभी उसके बुलाने पर दिगंबर के भवन की शोभा बढ़ाने लगा । वह मदिरा की रचना सुनता । कभी कुछ सुधार करता और उसके आग्रह पर अपनी रचनाएं भी सुनाता । साहित्य चर्चा धीरे धीरे निकटता में बदलने लगी । कभी कभी पति की अनुपस्थिति में भी वह उसे बुला भेजती और दोनों देर तक साहित्य , समाज और युद्ध आदि विषयों पर चर्चा किया करते ।
जब से रहीम का हर आना आरंभ हुआ था मदिरा कुछ अधिक ही प्रसन्न रहने लगी थी । मदिरा की प्रसन्नता से दिगंबर भी प्रसन्न था । व्यवसाय में व्यस्त रहने पर वह मदिरा के निकट न रह पाता । तब भी रहीम के साथ उससे मिलने की उसने पूरी स्वतंत्रता दे रखी थी ।
व्यापार के लिए उसे दो दिनों के लिए नगर के बाहर जाना हुआ तो मदिरा की आसक्ति की भावना उभर कर सामने आ गई । वह रहीम की मैत्री से अधिक स्वयं उसे पाना चाहती थी । न जाने कब , कैसे उसका अधूरा नारीत्व उस पर पुरुष के प्रेम पाश में बन्ध गया। पति की अनुपस्थिति ने उसे उच्छृंखल और दुस्साहसी बना दिया ।
निश्चिंत होकर उसने रहीम को दासी द्वारा बुलावा भेज दिया । रहीम के लिए या नवीन या अप्रत्याशित प्रस्ताव नहीं था । इसके पूर्व भी वह कई बार मदिरा के बुलावे पर उसका आतिथ्य ग्रहण कर चुका था ।
मदिरा के निजी कक्ष में प्रवेश करते ही रहीम को चकित रह जाना पड़ा । सुंदरी मदिरा सोलह सिंगार किये खड़ी थी । यह रूप मित्र या परिचित का नहीं अभिसारिका का था । प्रेयसी के रूप में उसे देख कर रहीम स्तम्भित रह गया । इतना रूप….. इतना सौंदर्य …. । मन ही मन व उसकी प्रशंसा करने लगा । मदिरा ने अभिवादन कर के प्रणय भाव से उसे अपने निकट बैठा लिया । मन के सारे संकोच छोड़ कर , सारी लज्जा को त्याग कर वह उससे प्रणय निवेदन कर बैठी –
“मैं तुमसे प्रेम करती हूँ । मैं नारी हूं मेरा अधूरा नारीत्व पूर्णता चाहता है । मैं माँ बनना चाहती हूँ । तुम्हारे जैसे सुंदर सहृदय और वीर पुत्र की माँ । मुझे स्वीकार करो । मुझे मातृत्व प्रदान करो रहीम ।”
रहीम के मस्तिष्क में भूचाल उठने लगा । वह पुरुष था । पुरुष जो सदा से नारी के नयन वाणों से घायल होता रहा है । परंतु मदिरा को उस रूप में देख कर उसे अपनी पत्नी नजमा की याद आ रही थी जो उन्हें एकनिष्ठ भाव से प्रेम करती थी । वह स्वयं भी अपनी पत्नी से असीम प्रेम करता था । मदिरा के प्रणय आमंत्रण को , उसके अभिसार के निवेदन को स्वीकार करना क्या उस भोली , विश्वास करने वाली समर्पिता पत्नी के प्रति अत्याचार नहीं है ? और मदिरा … वह भी तो पर – स्त्री है । किसी दूसरे की पत्नी के साथ अभिसार करना प्रेम नहीं व्यभिचार है । यदि रहीम जैसा समाज का नेतृत्व करने वाला व्यक्ति ही ऐसा करेगा तो साधारण लोग क्या करेंगे ? नहीं ..नहीं ..यह गुनाह है । पाप है । इस प्रकार यह अनिंद्य सुंदरी पथभ्रष्ट हो जाएगी । यह अनाचार …… ओह …”
रहीम ने अपने विचलित होते हृदय हुए को संभाल लिया । अपने चरित्र की कठिन परीक्षा की घड़ी में उसने स्वयं को संभाल लिया । उसकी आंखें बड़े अपनत्व , बड़े स्नेह से चमक उठीं । वह मदिरा की गोद में सर रखकर लेट गया । बोला –
“मेरे समान पुत्र चाहती हो तो मुझे ही अपना पुत्र समझ लो । तुम्हारे जैसी विदुषी , सहृदय और स्नेह करने वाली माँ तो बड़े नसीब वालों को ही मिलती है । काश ! मैं तुम्हारी कोख से पैदा हुआ होता । सच तब मैं भी तुम्हारी तरह खूबसूरत होता । आज से मैं तुम्हारा बेटा हूँ और तुम मेरी माँ । देखो , इस सुख से मुझे कभी वंचित न करना ।”
मदिरा रहीम की बात सुनकर काँप उठी । अगले ही क्षण दुख और पश्चाताप के आंसू उसकी आंखों से झर झर कर रहीम का मुख धोने लगे । उन आंसुओं के साथ उसके हृदय की सारी दुर्भावनाएं बह गई ।
जीवन भर रहीम ने अपनी इस वह बोली माँ का ध्यान रखा । कुछ वर्षों बाद दिगंबर की मृत्यु हो गई । तब निराश्रिता मदिरा का संपूर्ण दायित्व रहीम ने स्वीकार किया । पति की मृत्यु के बाद वह भी अधिक दिनों तक जीवित नहीं रही । उसकी मृत्यु होने पर रहीम ने पुत्र के समान ही उसकी अंतिम क्रिया संपन्न की ।
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