बूट पॉलिश

“बूट पॉलिश”
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ट्रेन अपनी रफ़्तार से चली जा रही थी। सामने की सीट पर बैठा हुआ वो युवक उस रफ़्तार के साथ मेरा सुकून चैन सब उड़ाए लिए जा रहा था। मैं एक ५० साल की धीर गंभीर महिला और उसकी उम्र लगभग २८ से ३० के बीच। अपनी याददाश्त के हिसाब से मैंने न कभी उसे देखा था न कभी मिली ही थी। पर जब जब मेरी नज़र उस पर जाती उसे अपनी ओर देखता हुआ पाती। बस यही बात मुझे असहज बना रही थी। चूंकि किसी से जल्दी फ़्री होना मेरी आदत नहीं और साथ ही पती और बेटे की चेतावनी कि ध्यान रहे आज कल हर वेश में बहरूपिए और ठग मिलते हैं मैं बिना कुछ बोले खिड़की से बाहर देखती रही। आख़िर गाड़ी मेरी मंजिल पे पहुंच गई। लखनऊ आ गया था। मुझे यहीं उतरना था। मैंने अपना ट्राली बैग सीट के नीचे से निकाला ही था कि वह बोला……मैं कुछ मदद करूं ? नहीं मैं कर लूंगी बहुत सख़्त लहजे में मैंने कहा।
” नहीं मुझे करने दें प्लीज़” गाड़ी यहां अभी कुछ देर रुकेगी आप परेशान न हों बड़ी विनम्रता से वो बोला।

स्टेशन पे सामान रखने के बाद उसने कहा……
शायद आपने मुझे पहचाना नहीं ??????
मैं……छोटू…… बूट पॉलिश……

बूउउउउउट पालिशशश……….?

मैं अवाक सी कुछ देर सोचती रही…
फिर एक एक करके सारे मंज़र साफ़ होते चले गए

हम पती पत्नी चहलक़दमी करते हुए बाज़ार से आ रहे थे कि आवाज़ आई “बूट पॉलिश”……. बूट पॉलिश कर दूं साब ?????
तक़रीबन १० साल का एक बच्चा पालिश ब्रश हाथ में लिए हमारी तरफ़ देख रहा था।
हमें रुका हुआ देख कर जल्दी से बोला……… करवा लो न साब सिर्फ २ रुपए लूंगा।
मैंने मिन्नत भरी नज़रों से पती को देखा तो न चाहते हुए भी उन्होंने हां में सर हिला दिया।
फिर क्या उसके हाथ मशीन की तरह चलने लगे।
काम में मगन वो बोले जा रहा था आज मां बहुत ख़ुश होगी मैंने १० रुपए कमा लिए।
मैंने पूछा छोटू तुम पढ़ते कब हो ?????
पढ़ता था अब नहीं। वो बोला ।
बप्पा कहता था कि मुझे ख़ूब पढ़ाएगा बड़ा आदमी बनाएगा पर एक दिन मज़दूरी करते हुए बिल्डिंग से गिर कर मर गया……. बस पढ़ाई ख़त्म। अब मैं अपनी बीमार मां के साथ यहीं पास में रहता हूं।
लो हो गया साब उसने चमकीली आंखों से हमें देखा।
पती ने २ रुपए उसे दिए तो वो ऐसे ख़ुश हुआ जैसे २०० रुपए मिल गये हों।
मैंने अनायास ही पूछा .. फिर से पढेगा ??
वो ख़ुश हो के बोला “हां”
हम घर आ गए
दूसरे दिन मैं उसे अपनी सहेली के एक NGO में ले गयी।
NGO वालों ने उन मां बेटे की सहायता की और उस बच्चे की पढ़ाई की पूरी ज़िम्मेदारी ले ली
अक्सर मैं उससे मिलने NGO जाती रहती थी।
फिर पती के ट्रासंफ़र के बाद हमने वो शहर छोड़ दिया और वो छोटू बूट पॉलिश धीरे धीरे मेरे खयालों से ही निकल गया।
आज यूं इतना बड़ा एक ख़ूबसूरत नौजवान और वो छोटा सा छोटू बूट पॉलिश कोई मेल ही नहीं मैं बस उसे देखती रह गई
उसने बताया मैम आज मैं एक अध्यापक हूं और अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर एक NGO भी चलाता हूं जिसमें मेरे जैसे बहुत सारे बूट पॉलिश ज़िन्दगी के नये नये हुनर सीखते हैं।
मैम आज मैं जो भी हूं आप के कारण हूं।
तभी ट्रेन ने सीटी दी वो जल्दी से मेरे गले लग कर बोला
मैम मैं कहीं भी रहूं आप हमेशा मेरे साथ रहेंगी और भाग कर ट्रेन में चढ़ गया।
ट्रेन की रफ़्तार के साथ साथ उसका हिलता हुआ हाथ धीरे धीरे धुमिल होता चला गया
मैंने भी अपना बैग उठाया और चल पड़ी ये सोचती हूई कि कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं जैसे मैं और मेरा प्यारा “बूट पॉलिश”।

“नसरीन”(स्वरचित)

         

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