सुबह की पहली अज़ान

सुभानअल्लाह पुरानी दिल्ली के, पुरानी मस्जिद के बड़े मौलवी है। पिछले 40 बरसों से वो रोज़ पाँचों वक़्त की अज़ान दे रहे हैं.. और वही नमाज़ भी पढ़ाते है। लेकिन कहा जाता है कि मौलवी सुभानअल्लाह सुबह की नमाज़ बड़ी तवक़्कुफ़ के साथ पढ़ाते है और उतनी ही ख़ुशमिजाज़ी का आलम उनके पढ़ने वालों में भी देखा जाता है। मौलवी सुभानअल्लाह अपनी बीबी आरिफ़ा बेगम के साथ मस्जिद से 2 किलोमीटर की दूरी पर एक किराये के मकान में रहा करते है। मकान पुरानी सी है.. कमरे में एक चारपाई है, कुछ मिट्टी के बर्तन हैं तो कइयों किताबों की मज़ारे।
सुभानअल्लाह साहब किताबों के बहुत बड़े शौकीन है। जब भी उन्हें थोड़ी सी भी फ़ुरसत मिलती है वो मीर, ग़ालिब या दाग़ में किसी ना किसी बहाने डूब जाते है। मीर और ग़ालिब के तो कइयों शे’र उन्हें जबानी याद हैं और किसी ना किसी मौके वो उसे दुहरा भी लेते है। एक बार ऐसा ही वाक़िया याद आता है जब मौलवी सुभानअल्लाह फ़ज्र की अज़ान देकर अपने घर की तरफ़ रूख़ कर रहे थे तो मुहल्ले के कुछ मनचले किसी लड़की को रिझाने की कोशिश कर रहे थे। उनका ये देखना था कि वो यकायक से मीर का ये शे’र दुहरा बैठे..

जीते-जी कूचा-ऐ-दिलदार से जाया न गया
उस की दीवार का सर से मेरे साया न गया।

क्या तुनक हौसला थे दीदा-ओ-दिल अपने आह!
इक दम राज़ मोहब्बत का छुपाया न गया।

शे’र गुनगुनाकर मौलवी साहब मजे-मजे से घर की तरफ़ चल पड़े। बीबी आरिफ़ा मुँह लटकाए उनका इंतज़ार कर रही थी। अब वो ख़ुदा के बंदे है.. ख़ुदा तो नहीं.. तो जाकर बीबी से पूछा – जी! फ़रमाइये क्या ग़ज़ब हो गया? मुँह क्यूं इतना उखड़ा सा बना रखा है?
बीबी ने बेरूख़ी से कहा- क्या कहूँ? कोई बात नहीं।
मौलवी साहब चबूतरे पर बैठते हुए कहे-

है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँ
वर्ना क्या बात जो कर नहीं आती।

बीबी ने ये सुना तो बुदबुदाकर बोल पड़ी- हर बात में शायरी.. हद होती है। कैसा ख़ुमार सर चढ़ाकर रखा है.. दुनिया का कोई होशो-हवास ही नहीं।
मौलवी साहब ने ये सुना तो बोल पड़े- शे’र लिखा ही इसलिए जाता है कि हम उसे हर मौजूं पर पढ़ सकें.. इसलिए तो आज भी.. इतने सालों के बाद.. ग़ालिब और मीर के गुजरने के बाद भी.. हम कहते हैं कि ग़ालिब कहता है या मीर कहता है, ये कभी नहीं कहते की ग़ालिब कहता था या मीर कहता था।
बीबी ने बात को घूमता हुआ देखा तो सीधी ज़बान से बोल पड़ी- मुनीम आया था.. कर्ज़ों के ब्याज के लिए.. काफ़ी सुनाकर गया है.. और ऊपर से धमकी भी दी है कि इस बार कर्ज़े का भुगतान नहीं हुआ तो मकान खाली करवा लेगा।
मौलवी साहब ये सुनकर बोलें – देखते है! अल्लाह की जैसी मर्जी.. मैं कुछ इंतज़ाम करता हूँ। कर्ज़े तो कैसे भी करके वापस करनी है, कौन ये बला लेकर अल्लाह के पास जायेगा?
ये बात तो मौलवी साहब ने बड़ी आसानी से अपनी बीबी से कह दिया था लेकिन वो अंदर ही अंदर इस बात से काफ़ी परेशान थे।
दोपहर के करीब 2 बजे थे। मौलवी साहब नमाज़ पढ़ाकर मस्जिद से बाहर निकल रहे थे तभी कुछ लोग उनसे मुख़ातिब हुए और कहा- असलाम-ओ-वालेकुम मौलवी साहब!
मौलवी साहब ने जवाबी वालेकुम पढ़ा और कहा – जी, फ़रमाइये?
उनमें से एक शख़्स ने आगे बढ़कर कहा- जी, हमलोग मस्जिद की मरम्मती की दरख़्वास्त लेकर आपके पास आये हैं.. अग़र आप ठीक समझें तो हमें ये नेक़ काम करने की इजाज़त दे।
मौलवी साहब ने बड़े ग़ौर से उन्हें देखा और कहा – अल्लाह ने आप लोगों को इस काम के लिए चुना है.. मैं कौन होता हूँ मना करने वाला, आप जब से चाहे अल्लाह की ख़िदमत में हाज़िर हो जाएं।
मौलवी साहब से ये सुनकर वो लोग ख़ुशी-ख़ुशी वापस लौट गए। मौलवी साहब ने ऊपर आसमान की तरफ़ देखा और कहा – अल्लाह! सब तेरी मर्जी है।
रात को जब मौलवी साहब खाने पर बैठे तब बीबी ने फ़िर सवाल किया- कुछ हुआ?
मौलवी साहब ने निवाला मुँह में रखते हुए कहा – एक-दो लोगों से बात की है.. मदद की गुंजाइश हो सकती है। सब अल्लाह की मर्जी है .. शायद कोई काम बन जाएं।
आज कुछ लोग मस्जिद की मरम्मती की बात लेकर आए थे मस्जिद में।
फ़िर?-बीबी ने उत्सुकता में पूछा।
मैं क्या कहता.. अल्लाह का फ़रमान आया है.. तो बनना ही चाहिए। वैसे भी मज़ार अब जगह-जगह से फूटी पड़ी है.. मीनारों में भी जान ना के बराबर है.. मरम्मत ही सही कुछ दिनों तक तो नमाज़ियों को दिक्कतें नहीं होंगी।
शुकर है अल्लाह का।-बीबी ने कहा और जूठे बर्तनों को समेटकर भूसलखाने में चली गई।
कुछ रोज़ मौलवी साहब दिन-रात एक करके मस्जिद की मरम्मती में गुजारने लगे.. इधर कुछ दिनों बाद फ़िर मुनीम एक रोज़ उनके मकान जा धमका.. दो दिनों की धमकी दी और वापस चला गया। मौलवी साहब बहुत परेशान हो उठे और पैसों की जुगत की कोई राह ना देखते हुए वो एक सस्ते से किराये की मकान का तलाश करने लगे। मग़र इस दिल्ली जैसे शह्र में कम किराये पर मकान कहाँ मिलती है? मौलवी साहब काफ़ी परेशान हो चले.. धीरे-धीरे उनकी सेहत भी गिरने लगी।
एक रोज़ सुबह ख़ांसते हुए मौलवी साहब ने आरिफ़ा बेगम से कहा- बीबी! जो कुछ सामान बाँध सको, बाँध लो.. शायद हमारा और इस मकान का सफ़र यही तक था।
बीबी ने सुना तो कहा- लेकिन मौलवी साहब अब हम जायेंगे कहाँ?
मौलवी साहब ने दबे गले से कहा- जहाँ अल्लाह की मर्जी.. अभी कोई ठिकाना नहीं।
मौलवी साहब की हालत को देखकर बीबी ने कोई सवाल नहीं किया और कुछ सामान बाँधकर उनके साथ चल पड़ी। रास्ते पर मुनीम कुछ लोगों को लेकर आता हुआ दिखा.. मौलवी साहब ने बड़े अदब से कहा- ये कमरे की चाबी है और वो कोशिश करेंगे कि जल्द से जल्द वो साहूकार का सारा सूद वापस कर दे।
मुनीम ने उनसे चाबी ली और लंगड़ाता हुआ घर की तफ़सील करने चल पड़ा। मौलवी साहब कुछ देर रूककर उसे जाता हुआ देखे फ़िर अपनी भरी आँखों से वापस मुड़े और आगे चल पड़े। मौलवी साहब ने सोचा आज सुबह की अज़ान छोड़ देता हूँ दोपहर तक कहीं रहने का बंदोबस्त करता हूँ फ़िर अल्लाह से अपनी इस ज़ुर्रत की माफ़ी माँगकर दोपहर की नमाज़ अदा करूँगा।
मौलवी साहब ख़ामोशी से रस्ते को नापने लगे। नज़र नीची करके चलने के कारण उन्हें यह तक ना दिखा की सामने एक गाड़ी उनके सामने खड़ी है.. यकायक उन्हें होश हुआ तो वो नज़र उठाकर कहते है – माफ़ कीजिएगा!
सामने देखा तो ये वही मरम्मती के काम करने वाले लोग थे। उन्होंने सलाम किया और कहा – मौलवी साहब दरअसल में हम अभी आपके पास ही आ रहे थे.. हमने मस्जिद के ठीक पीछे एक मकान आपके लिए बनवाया है जिससे आपको किसी मौसम अज़ान देने में कोई परेशानी ना हो.. मग़र हमें लगता है कि इसकी ख़बर आपको पहले ही मिल गई। चलिए शुक्र है.. आइये हम आपको ले चलते है।
मौलवी साहब अपनी बीबी को देखकर भरी आँखों से मुस्कुराते है.. बीबी अपने दुपट्टे से अपनी आँसुओं को छिपाने की कोशिश करती हैं।
मौलवी साहब ऊपर आसमान में देखकर कहते है – तू मेहरबान है अल्लाह.. सब तेरी मर्जी है।
मौलवी साहब उन लोगों के साथ मस्जिद पहुँचते है और सुबह की पहली अज़ान देते है।

         

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