आहूति

—-आहूति—-
इंसान चाहे कितना भी मजबूर हो,गलत करते समय उसे अहसास रहता है कि वो क्या कर रहा है।विवाह की वेदी पर बैठी श्रेया की आँखें नीची थी।भीतर ही भीतर उसके मन में एक लावा -सा फूट रहा था। सामने खड़े भैया भाभी भी ये महसूस कर रहे थे कि जाने क्यूं श्रेया इस विवाह से खुश नहीं लग रही।उसका चेहरा भाव-शून्य था।पंडित जी मंत्रोच्चारण कर रहे थे। वह हवन-कुंड़ में आहूति दे रही थी ऐसे जैसे मानो उसका एक एक सपना जल कर ख़ाक हो रहा हो।
सामने खड़े श्रेयस की तरफ श्रेया की असहाय नजरें उठीं, नजरें मिलते ही श्रेयस ने चेहरे पर जबरन मुस्कान लाकर हल्के से पलकें मूंदी तो दो आँसू ढुलक पड़े।उसको कोई और नहीं देख पाया।वह थमस् अप की क्रिया कर मानो श्रेया को आश्वास्त कर रहा था कि –” कोई बात नहीं ,सब ठीक कर रही हो तुम।”
श्रेया का मन अब कुछ हल्का था। उसने श्रेयस के आश्वासन के सहारे कर्तव्य की वेदी पर अपने सपनों की आहूति दे दी, अपनों की खातिर।
—-राजश्री—-

         

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