अनजान शहर

अंजान शहर
बिलासपुर सीपत चौक से तांगा ले रेलवे स्टेशन चलने की गुजारिश की ।
रात के सन्नाटे में सड़क सुनसान ,घोड़े की टॉप की आवाज ओर बीच बीच में टाँगे चलाने वाले बुजुर्ग की आवाज खांसने की ।
अचानक टांगे वाले ने कहा ,, बाबू जी जरा मसान गंज से घोड़ी के लिए दाना लेले ता हूँ ।
हम मौन सहमति दे सोच रहे यदि मना कर दूँ तो ?
क्या नहीं लेगा दाना ।
तांगा इधर उधर गलियों से होता एक सुनसान अँधेरी जगह रूका ।
कुछ देर कुछ चढाने ,उतारने की हलचल , हमे उबास लगने के साथ नींद भी सताने लगी, चलो कोई बात नहीं ,जितने देर होगी उतना अच्छा ,आखिर ट्रैन तो रात्रि 3 बजे है , स्टेशन पहुँच भी ठंड से बचना होगा तो यही ठीक है, कब आलस ने अपना आगोश बढ़ाया संमझ ही न आया ।
अचानक बाबू जी बाबू जी लो स्टेशन आ गया ,चलिये आप उतरिये ।
अरे हम कितनी देर सो गए ?
कितना दे बाबा किराया ?
चार आने ही तो किराया है बाबू जी आप उतने ही दीजिये ।
हंमने लो भाई इतनी रात को आपने मदद की हमे ,,पर स्टेशन तो दिख नहीं रहा? जरा और आगे चलते न ,,
नहीं बाबू जी हम यहीं तक आते है ये गली से आप निकल जाईये।
हंमने आठ आने निकाल ,,लो बाबा ये अठन्नी रख लीजिए , तांगे वाले ने हाथ बढ़ाया ,एक झुरझुरी सी सिहरन सारे बदन में दौड़ गयी
वो हाथ इंसान का नहीं ,,,,घोड़े का खुर था ,
हिम्मत बटोर ये कक क्या मजाक करते हो उसके चेहरे की ओर नजर डाली,,,,,,
लाल आँखों वाले घोड़े, का मुख,
और,,,,,,,
दूसरे दिन सरदार पटेल अस्पताल में,,,,
अरे ये शमशान घाट के पास बेहोश पड़ा था शायद दारु पीकर
सुबह देखा तो ,,यहाँ ले आया ,,
नवीन कुमार तिवारी,,,,

         

Share: