चित्र आधारित लघुकथा -दरख्त

रोहन और रश्मि घर छोड़ते समय बच्चों संग साथ बहुत उदास थे| आज उनको सरकारी कोठी खाली कर दूसरी नई मिली कोठी में जाना था| इस कोठी में २५ साल रहे थे| एक–एक पेड़ उनके गम और खुशी की परछाई थे| बेटी पलक जिद्द कर बोली, “हम अपने नीम के पेड़ को छोड़ कर नही जायेंगे|” बेटा विभु कहने लगा, “मुझे भी अपना मीठी जामुन और अमरुद का पेड़ नही छोडना|” रश्मि बोली, “बच्चो घर तो छोडना ही पडेगा, यहाँ नया कम्प्लेक्स बनना है| सरकारी नीति में हम मजबूर हैं|” जंगलात दफ्तर वाले आ पेडो पर नंबर लगा गये| बच्चे चुपचाप देखते रहे| परिवार घर से जाते प्यार की तरसी नजर से सेल्फि लेकर उन पेड़ों को, खासकर नीम के पेड़ को, देख रहा था| ये पेड़ बहुत प्यार से बेटी ने पानी देकर पाला था| बच्चे जाते समय ढेर सारे फूल के बीज और नई ऊगी कलम नये घर में लगाने को ले चले| कुछ दिन बाद जब पता चला कि घर गिराए जा रहे हैं, रोहन खास तौर पर नीम के पेड़ को ना काटने की सिफारिश करने गया| सड़क पर लगे बिल के पेड़ जो मुरझा गये थे, प्रभु शिव का हवाला देते याद आते थे| अब रोहन बच्चों के साथ उस मुरझाये नीम के पेड़ को देख जब बच्चों का स्वर सुनता, “सावन में ये भी हरा-भरा हो जायेगा” और लेबर को छाया में बैठे देख बच्चों की खिलती सी हंसी में खो जाता|
मौलिक और अप्रकाशित.
रेखा मोहन १7/६/१८

         

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