परिपक्व

“परिपक्व”

नेहा आज फिलिपींस जा रही है।एक विदेशी कंपनी ने उसे एक प्रोजैक्ट के लिए सम्मानित किया है। साथ ही मंगेतर आकाश भी जा रहा है। मां ने नेहा के रुम की बत्ती जलती देखी तो आवाज लगाई ” नेहा बेटा! लाईट बंद करके सो जाओ ,सुबह की तुम्हारी फ्लाइट है। जल्दी उठ कर जाना भी है।” नेहा ने बत्ती बंद तो कर दी पर मानस-पटल अतीत की रौशनी से रौशन होने लगा।
जब वह मम्मी डैडी के साथ बी ई प्रथम वर्ष में दाखिला लेने गई थी। हर तरफ लड़के ही लड़के देख वह झेंपी हुई सी थी। जब एक लड़के ने उससे बात करनी चाही तो वह किस तरह बौखलाहट के साथ ज़वाब दे रही थी। शुक्र है ,मां ने बीच में बोल कर सब संभाल लिया था। मां ने शायद उसके मन की बात पहचान ली थी। मां से हुई हर बात जस की तस उसे याद आने लगी।वह कितनी विचलित थी। हमेशा की तरह आज भी उसने मन की बात माँ से कह दी।
” मम्मी ! कालेज में तो लड़के ही ज्यादा हैं, लड़कियां तो बहुत कम है।”
” तो क्या हुआ? तुम इतना असहज क्यों महसूस कर रही हो, बेटा?” मां ने कितने प्यार से उसे समझाया था।
” तुम्हारे ड़ैड़ी, तुम्हारा भाई भी तो लड़के हैं , क्या तुम उनसे सहज रूप से बात नहीं करती हो? करती हो न तो…..बस वैसे ही…..।”
” पर मां वो…..वो….वो तो।”
” हां तुम्हारे लिए वो अंजान हैं, पराये हैं, यही न? लेकिन अब वो तुम्हारे सहपाठी होंगे।”
” पर…..मां ….. । “पर वर कुछ नहीं जैसे स्कूल में पूनम, रवीना तुम्हारी सहेली हैं अब उनके साथ साथ कुछ लड़के भी तुम्हारे मित्र होंगे बस।” कुछ रुककर फिर मां ने कहा—-
” बस जरूरत है तो सिर्फ सहज रहने की, न कि घबराहट और शर्मीला-पन दिखाने की।”
सचमुच सब कुछ कितना सहज हो गया था। सम्मोहन के ख़तरों से बहुत ऊपर उठ चुकी थी वह एक गरिमामयी शख़्सियत के साथ।।
—–राजश्री—–

         

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