2 – लघुकथाऐं

इधर पोस्ट  हुई ,करके एडिट करना तो दूर  सोचने से पहले  ——-,ऐल् लो लाइक ठोक दिया किसी परम प्रिय मित्र ने। बढ़ी इतराहट ,ओह मेरी लिखे की ईन्नी बड़ी वेल्यूऊऊऊ। फिर घबराहट भी बढ़ने लगी- खरे उतरने की ।
नये फोन की लालसा बच्चों ने पहचान ली और एक अदद छूने वाला घमन्तु फोन ला दिया पर नाज़ुक से को छूने मे ही ड़र लगता बिना छूकर चलता कैसे ? आखिर मैं भी चलाने सीखने औऱ लिखने को बेताब थी, मरी जा रही थी।इसके कारण ही मेरी हेन्डराईटिंग मे जबरदस्त सुधार आया वरना खुद का लिखा बाद मे खुद पढने के लिए — बापरे बडी  -मशक्कत करनी पड़ती थी।
फिर मैंने सम्बन्धित चित्र बनाने शुरू किए लिखे हुए के बगल मे।चलो अब आराम हो गया हेन्डराईटिंग जो सुधर चुकी है। सॉरी हम लक्ष्य से भटक गए —–।
एक दिन सीखने की हड़बड़ी मे न केवल सब कुछ उड़ा दिया वरन् नमस्कार लिखना चाहा तो “चेहरे की किताब” नदारद -उफ् !ओह! आह !ओ माँ :::::::!!!
अहा !!!!!बच्चों ने नई पहचान सेट की तो ::
(न) पर लाईक् क्ससस। ?
बस मैं समझ गई क्षेत्र कोई भी हो हमें कर्म करना पड़ता है करना भी चाहिए अब मैं कर्मयोगी हूँ न केवल पोस्ट पढ़ती हूँ बल्कि “छींटाकशी” भीकरती हूँ।मैं पढ़ासू कर्म योगी हूँ ।
२___आइना
★आईना★

खनछिन्न,खड़ाखड़ खिलछनाक छनाक की आवाज सुन,रसोई की तरफ- मोबाइल पटक कर दौड़ी नवोदिता । कलछी -कटोरी, चम्मच-चाकू मे खटरपिटर गिटरपटर चल रही थी ।इक अबोला अड़ियल सा शब्द संग्राम जारी था,गिलास कप के मुरझाए से चेहरे,अस्तव्यवस्थता,  धूमिल सी थालियाँ , कराहती कढ़ाई -तमतमया तवा सभी मुँह चुरा रहे थे उन्हें निहारने मे भी मशक्कत करनी पडी नवोदिता को ।उफ् कितने गंदले ?
भारी मन से बाहर आई तो मोबाइल की चमकती स्क्रीन से मन मुदित हो गया ।मन ने भावों के घुंघरू पहन लिए  ।शब्दों की अठखेलियाँ के नर्तन पर संगत दी स्क्रीन पर तबला बजाती उगँलियों ने ।भीनी  श्वेत सुगंधित जाजम बिछ गई ,सज गई स्वप्निल महफिल और ह्रदयाकाश से सुनाई  देने ही वाला है कल्पना का  सुमधुर कलरव । नवोदिता ने ठान ली है कलम और कलछी मे बेहतर सामंजस्य की।हौंसले और फैंसले दोनो ही बुलंद है ।सधी चाल और स्थिर कदमों से रसोई मे कदम रक्खा और जैसे ही सिंक का नल खोल विमबार हाथ मे उठाया इधर प्लेट झिलमिल  कर खिलखिलाती हुई आईने मे तब्दील हुई और उधर  नवोदिता अपने ही रूप सौन्दर्य पर लट्टू ।
मधु खंडेलवाल ,
रोहिणी ,दिल्ली ।

         

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