हाउसवाइफ

अभी पढ़ाई खत्म भी नही हुई कि निशा की माँ ने शादी कर अपनी जिम्मेदारी से पीछा छुड़ा लिया था।शादी के बाद पढ़ाई शुरू रहेगा,जब तक तुम्हारी मर्जी होगी। ऐसा आश्वसन दे कर।
निशा ने बहुत कोशिश की कि ये शादी ना हो,खुद को अपरिपक्व समझ रही थी जिम्मेदारी निभाने के लिये, लेकिन माँ ने जैसे जिद ठान ली थी।कि शादी होगी तो ये ही इतनी जल्दी इतना अच्छा रिश्ता कहाँ मिलता है।
घर – खानदान अच्छा और क्या चाहिए?
दस दिन बाद शादी थी।शादी की व्यस्तता में दिन कहाँ निकल गए पता ही नही चला।
शादी कर निशा अपने ससुराल आ गयी।सुबह इंग्लिश का एग्जाम था।जल्दी से तैयार हो पूजा की और फिर दुपहर हो गयी।
रिक्शे में बैठ कॉलेज के लिए निकल दी।आँखे नीद के बोझ से भारी हो रही थी।निशा को कुछ सूझ नही रह था।बस एग्जाम कैसा होगा ये टेंशन में कब कॉलेज आ गया पता नही चला।
लास्ट एग्जाम था।सभी सहेलियॉ निशा को छेड़ रही थी,जीजा जी कैसे है??रात को क्या पढ़ाई की तूने?
सहेलियों की मस्ती मजाक में पैदल घर के लिए निकल दी।
घर आ कर निशा से सासु माँ ने तीक्ष्ण शब्दों में कहाँ, निशा ऊपर कमरे में जा कर कपड़े बदल के नीचे आओ।सारा काम पड़ा है।बहुत हो गयी पढ़ाई।अब आखिरी पेपर दे दिया।
अब घर के काम सम्भालो,निशा पर जैसे “बिजली सी गिर गयी”।सकुचा कर बोली,पर मम्मी जी मुझे तो आगे और पढ़ाई करनी है।पापा जी ने वादा किया था,की जितना चाहो पढ़ोगी।हम में से किसी को कोई आपत्ति नही होगी।

सासु माँ तीक्ष्ण मुद्रा में व्यंग करते हुए बोली कि हो गयी पढ़ाई करने क्या है पढ़कर, बनना तो हाउसवाइफ ही है और कौन सा नॉकरी करनी है तुम्हे।

पापा जी की बात पापा जी से करना,तुम्हे क्या लगता हैं वो मेरी मर्जी के खिलाफ कुछ बोलेगे।

निशा को “काँटो तो खून नही”,ऐसा लग रहा था।जैसे हाउसवाइफ की तख्ती किसी ने सर पर जबरन ठोक दी हो।

उफ़्फ़फ़फ़ ये हाउसवाइफ एक आजीवन कैद की सजा से कम तो नही थी।
सारें अरमानो का गला घोंट दिया गया था,हाउसवाइफ की पदवी दे कर।

✍संध्या चतुर्वेदी
मथुरा उप

         

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