इन्सानियत

शाम का धुँधलका छाने लगा था, अनुप्रिया सड़क के किनारे खड़े होकर ऑटो रिक्शा की प्रतीक्षा कर रही थी।

आज ऑफ़िस में कुछ ज़्यादा ही देर हो गयी, ये मल्टीनेशनल कम्पनीज़ की नौकरी मुई होती ही ऐसी है, आने का समय तो निश्चित होता है परन्तु जाने का कोई फ़िक्स टाइम नहीं , और आज तो बीकानेर वाले मामाजी भी आ रहे है,घर जाकर रात की भोजन व्यवस्था भी देखनी है, इन्हीं सब विचारों में उलझी थी अनुप्रिया । अचानक किसी के ज़ोर-ज़ोर से चीख़ने की आवाज़ से उसकी तन्द्रा टूटी, सड़क के दुसरे छोर पर एक कृशकाय व्यक्ति उसकी ओर इशारा करता हुआ कुछ अस्पष्ट सी आवाज़ में चिल्ला रहा था।
मैले कपडे,बिखरे बाल और कंधे पर एक जूट का थैला । सोचा कोई विक्षिप्त या भिखारी है शायद, अपनी ही उधेड़बुन में लगी अनुप्रिया ने बड़ी हेय दृष्टि से एक बार उस ओर देखा, फिर परे देखने लगी । अचानक वो शख़्स भागता हुआ उस पर झपट पड़ा, लगा जैसे भूचाल आ गया हो, सर बहुत ज़ोर से सड़क से लगे खम्बे से टकराया और सब अँधेरा…
आँख खुली तो अपने आप को अस्पताल के बिस्तर पर पाया, माँ और दोनों भाई सिरहाने खड़े थे।
“वो..वो आदमी” भय मिश्रित आवाज़ में पहला शब्द यही निकला, माँ सर पर हाथ फेरते हुए रुआँसे स्वर में बोली “बिटिया उसे तो स्वयं भगवन ने भेजा था तेरी रक्षा के लिये, तू जहाँ खड़ी थी उसके ठीक ऊपर बिजली का तार जल-जल कर बस टूटने ही वाला था, लोगों ने बताया की पहले उसने तुझे बड़ी आवाज़ें दी और जब तूने नहीं सुना तो तुझे बचाने के लिए सड़क के इस पार दौड़ लगा दी और तुझे वहाँ से धक्का दे दिया। बेटा उसने तुझे तो बचा लिया किन्तु स्वयं उस तार की चपेट में आने से नहीं बच पाया और जान से हाथ धो बैठा”।
अनुप्रिया के कान जैसे सुन्न पड़ गए थे, हृदय ग्लानि से भर चुका था। अश्रुधार ऐसी बही जैसे कोई जंगली नदी तटबन्ध तोड़कर पूर्ण वेग से बह निकली हो। बस एक ही बात मन में घुमड़ रही थी की काश..काश मैं उसकी बात सुन लेती और ज़ेहन में केवल एक प्रश्न था कि आख़िर क्या रिश्ता था उसका मुझ से, कोई भी तो नहीं …
क्या इंसानियत की और भी कोई पराकाष्ठा हो सकती है ?????।
भरत दीप
11.07.18

         

Share: