कर्ममंच ( कर्मा )

कर्ममंच ( कर्मा )
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तीखी यंत्रणा और सिसकिया दब कर रह गई मेरी।आज जहां बैठा हूं सायद नहीं होता।ह्रदय की ध्वनियां धम-धम कर रही थी। एकाएक मै एक बोझ बनकर अपनों की आँखों में खटकने लगा। मेरे अपनों ने कैसे मुझे अपने आप से काट कर खुद से अलग कर दिया था। ऐसा लगा जैसे मेरा पाप मेरे गुनाहों को दोहरा रहा हो। वक्त मुझे मेरा गुजरा हुआ कुरूप चेहरा दिखा रहा था।
आँखों में आए आंसुओं से चेहरा दर्द से भर दिया। पर किया हो सकता था ये कर्ममंच था,कर्मा।
जो किया था कभी मेने किसी ने आज उसे दोहराया नहीं होता।अगर उस दिन मेने अपना चेहरा आईने में देख लिया होता। तो आज मै यहाँ वर्द्धा आश्रम की चोखट पे न होता।।
साथी मुख़र्जी ( टीना )

         

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