चौकड़ी

“चौकड़ी”

मूसलाधार बारिश ने जनवरी की ठंड़ को अत्यधिक तीक्ष्ण बना दिया था। भीतर वाली कोठरी में तीन बेटियों की माँ कमला बेटे की आस में, प्रसव-पीड़ा से छटपटा रही थी। सास उसे ढांढ़स बंधा रही थी– ” बस बेटी इबकै और हिम्मत कर ले, एक छोरा सा हो ज्या तै फेर छुट्टी करिये बालक बनाण की।” तभी पीड़ातिरेक से कमला की चीख और आसमानी बिजली की तेज गर्जना ने गांव की अँधेरी सुनसान गलियों के माहौल को भयानक बना दिया
बाहर दालान में कमला की जेठानी अपनी दोनों बेटियों को अगल-बगल बाहों में समेटे सोने का उपक्रम कर रही थी। अचानक बादलों को फाड़ कर तड़तड़ाती योगमाया(बिजली) जैसे पृथ्वी पर गिरी हो, उसके साथ ही कमला की लम्बी चीख के बाद माहौल जैसे शांत सा हो गया।रजनी अब भी भय से कांप रही थी। उसने अपनी दोनों बेटियों को सीने में समेट लिया।
कमरे से दाई की फुसफुसाहट के साथ ही सास ग्यानो के रोने-चीखने की आवाजें आने लगी बूढ़ी ग्यानो अपनी छाती पीट-पीट कर रो रही थी। “हाय रे!मर ग्ये हम तै या चौत्थी और होगी, चौकड़ी बणगी।” सहसा बूढ़ी का स्वर कठोर होने लगा। रजनी ने जैसे किसी अनजाने भय से बचाने के लिये रजाई को कस कर अपनी लाड़लियों को छुपा लिया।
—-राजश्री—-

         

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