छलिया

उपवन से फूल तोड़ते फेंसिंग के तार में ऋषभ उलझ गया । कपड़े भी इधर उधर से फट गए और जख्म जो पुराना था फिर निकलने लगा खून वहाँ से।
जैसे तैसे आत्म संयत कर निकलने की जुगत दर्द पर विजय पाने की कोशिश ।
पर आज होनी कुछ और दशा की ओर इंगित कर रही , फुलवारी चौकीदार की लाठी की आवाज अचानक उसके पीठ पर सटाक से।
अच्छा ,,,,,तू है फूल चोर,,,,?
न नहीं मैं तो इस पिल्ले को यहाँ से निकाल रहा था कि तार में कपड़े फंस जाने से गिर पड़ा ।
झूठ बोलता है , चोरी करते पकड़ा गया तो?
चल आज तेरी खैर लेता हूँ , रोज गुलाब, डहेलिया कौन चोरी करता है ।
न नहीं मैं तो बस ये गुड़हल के एक फूल तोड़ता हूँ , वो भी माता भवानी के चरणों में सबसे पहले चढ़ाने के लिये, वो माता शारदा जी की कहानी में आल्हा जी के प्रसंग की वो सबसे पहले फूल पूजा कर चढ़ाते है ।
बस,,
अच्छा वो ,,, तू है जो रोज माँ भवानी में पुष्प चढ़ाता ।रोज सोचता ये कौन छलिया यहाँ आ गया ?
ठीक ,,,,
नवीन कुमार तिवारी

         

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