जननी का आशीष

जननी का आशीष

आँसुओं के सैलाब में रेवा का दिल डूबा जा रहा था,वह बेतहाशा छटपटा रही थी। तभी माँ की आवाज ने चौंका दिया।मां दरवाजे पर खड़ी थी। ” ऐ रेवा! फिक्र मत कर सब ठीक होगा, तू रो मत।” मां की आवाज के साथ ही रेवा ने आँखें खोल दी। उसका दिल जोरों से धड़क रहा था। आंखों के दोनों कौरों से आँसू बह रहे थे। साइड़ टेबल पर रखे मोबाइल में वक्त देखा भोर के साढ़े चार बजे थे।वह जब भी किसी संकट या परेशानी में होती, माँ उसके स्वप्न में आ जाती। दिवंगत माँ अधरों पर चिरपरिचित मुस्कान व आँखों में करुणा के भाव लिए उसके दुखी हृदय को अपनी ममता से सहला जाती।
रेवा ने सायं फोन पर बेटी व बेटे को बात करते सुन लिया था। किसी संभावित परेशानी की आशंका से वह दुखी थी। पूछने पर बेटी ने मां के परेशान होने के डर से कुछ नहीं बताया।वो स्वप्न जो परिवार ने खुली आंखों से जाग्रत अवस्था में देखें थे धूमिल होते नजर आ रहे थे। किन्तु उसे सपनों से ज्यादा बेटे की चिंता थी। साथ में सो रही बेटी पर नजर डाल वह धीरे से उठी और घर में बने पूजा के आले पर माथा टिका सिसक उठी ” हे जगत-जननी! मेरे बच्चे की रक्षा करना।” माता के चरणों में सारा दर्द उड़ेल वह नित्यकर्म में व्यस्त हो गई।अब शांत हृदय से वह बेटे के फ़ोन की प्रतिक्षा में थी।
बेटा विनय बी ई थर्ड ईयर में ही था जब उसका इंफोसिस कंपनी द्वारा कैंपस सलैक्शन हो गया था, और अब कंपनी द्वारा दी जाने वाली छ: माह की ट्रेनिंग पर मैसूर गया हुआ था। ट्रेनिंग टाइम में प्रतिदिन ट्रेनर पढ़ाने के बाद ही उसका टैस्ट लेते।विनय हर रोज माँ को फोन पर रोजाना की बातें करता। एक दिन फ़ोन पर विनय ने बताया कि टैस्ट में असफल होने पर एक ट्रेनी ने मानसिक दबाव के चलते आत्महत्या कर ली है। बात करते विनय का स्वर दबा सा व आवाज भर्राई महसूस हुई। रेवा अंजाने भय से अंदर तक सिंहर गई किन्तु प्रत्यक्ष में बोली ” बेटा असफलता का हल मौत नहीं है जीवन है तो सफलता के बहुत अवसर होते हैं।तुम ऐसा भूलकर भी मत सोचना वापिस आकर एम बी ए कर लेना। ” विनय का स्वर अब संयत सा था।उसकी अंतिम परीक्षा चल रही थी।
दस बजे विनय का फोन आया तो बेटी पारुल ने झट से उठा लिया। कांग्रेट्स भाई !कहते हुए खुशी मिश्रित रूलाई फूट पड़ी।शायद विनय भी फोन के उस पार इम्तिहान में सफलता पर खुशी अतिरेक के कारण रो रहा था। आँसुओं की अविरल धारा में तीनों आकंठ डूब गये थे।रेवा ने अश्रुपूरित आँखों से जगत जननी की तरफ़ देखा तो दिवंगत माँ को भी वहां खड़े पाया। उसने नतमस्तक हो करबद्ध नमस्कार किया।
—–राजश्री—–

         

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