प्रदर्शनी

लघु कथा-प्रदर्शनी
अख़बार पढ़ते पढ़ते माँ स्तब्ध हो बैठ गई।पिताजी समझ गए कि उन्होंने अवश्य ही मानवता को शर्मसार करती कोई खबर पढ़ ली है।वे बोले मनोरमा रेप और हत्या तो आजकल आम खबर है, कितनी बार कहा है तुम्हें ऐसी खबरें मत पढ़ा करो।माँ की आँखे नम थीं, सजल आँखों से वे बोलीं- नहीं जी! आज मन बहुत चिंतित हो रहा है ये सोचकर कि ईश्वर की सबसे सुंदर रचना मानव इतना नृशंश कैसे बन गया, क्या हमारी संस्कृति संस्कार इतने कमज़ोर हो गए हैं कि स्वलाभ के लिए हम कोई भी सीमा लाँघ सकते हैं। सही कह रहें हैं आप मैं रेप और हत्या की ख़बर से ही दुखी हूँ, जीवनदायनी माँ धरती और नदियों का बलात्कार ही तो हो रहा है।हर रोज़ नित नई प्रदर्शनी सी लगती है पर्यावरण संरक्षण के तहत नदियों को स्वच्छ रखने एवं धरती को प्रदूषण मुक्त करने के नए नए उपाय सुझाए जाते हैं,अखबारों, टीवी,सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर सुझाव दिए जाते हैं,स्कूली बच्चे तक रैली निकालते हैं पर हम लोगों का व्यवहार किसी प्रदर्शनी में रखी तस्वीरों की तरह हो गया है, जो आकार और रंग ले लिया उसी में फ्रेम होकर बैठ गए हैं।
नीलम शर्मा

         

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