माता निर्माता भवति

सात साल पहले घर छोड़ा था उसने,घर क्या मकान छोड़ा था, जिसने मधुर कम और दुखद यादें अधिक दीं थी उसे।

प्रभा अपने साथ केवल अपने दस वर्षीय बेटे अमित को ही लायी थी वहाँ से। विवाह के 12 साल बाद इतना बड़ा क़दम उठाने में उसे महीनों सोचना पड़ा था।
आज अमित 17 साल का है और प्रभा ने उसे सबसे आला कोचिंग सेंटर में दाखिला भी दिलवाया था मगर वो सेलेक्ट नहीं हो पाया था।
चार दिनों से अमित ने कुछ नहीं खाया था, प्रभा भी भूखी रही उसके साथ।
“माँ, मान जाओ न, पिताजी से कहकर मैं अपने एडमिशन के लिए डोनेशन के पैसे जमा करवा लूँगा, आप पर एक्स्ट्रा बर्डन नहीं आने दूँगा, बस आप हाँ कर दो।’,अमित ने आज फिर माँ को मनाने की कोशिश की थी।
अमित बेटे, मेरा जीवन बस तुम्हारे ही लिए है और मैं जब सात वर्ष पूर्व एक अपनी अकेले की तनख्वाह पर तुम्हें यहाँ तक ला सकती हूँ, तो लोन लेकर कॉलेज में तुम्हारा एडमिशन भी करा सकती हूँ,मगर उससे होगा क्या?,तुम भी डिग्री धारी इंजीनियर तो बन जाओगे और साथ ही देश के लिए एक बोझ भी। नौकरी मिल भी गयी तो किसी पुल के गिरने के ज़िम्मेदार होगे,या किसी मशीन के ग़लत डिज़ाइन या कोई ग़लत सॉफ्टवेयर या हार्डवेयर बना कितनी ही जिन्दगियों को तबाह करोगे।मैं चाहती हूँ कि तुम मेहनत करो और योग्य बन सिलेक्शन टेस्ट पास कर इंजीनियर बनो या यह मार्ग छोड़ विज्ञान विषय से ग्रेजुएशन कर अपना नया मार्ग चुन देश और मानवता के लिए हितकारी बन सिद्ध करो कि तुम मेरे अद्वितीय बेटे हो। ज़रूरी यह नहीं कि तुमने किस कॉलेज से डिग्री ली,ज़रूरी यह है उस डिग्री के लिए कितनी ईमानदारी और लगन से पढ़ाई की।”
अमित अबतक अपनी माँ को अपने अंदर महसूस करने लगा था । वह खाना परोस कर माँ को टेबल तक ले आया था।

शुचि ‘भवि’
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