।। शातिर वो नज़र ।।

आज ही आयी थी वो, हॉस्टल छोड़ पेईंग गेस्ट बनकर रहने के लिए।हॉस्टल का खाना ही तो बस समस्या बन गया था उसकी।
वर्तमान के उसके आवास और किचन में सात सौ मीटर का फासला था।रोज़ शाम लगभग साढ़े पांच बजे, पैदल ही वह अपने खाने का पैकेट लेने बाज़ार को पार करके जाती थी।
आज भी शालिनी,कल की ही तरह, बाज़ार होते हुए गंतव्य तक जा रही थी, मगर आज का दिन,कल सा नहीं था।आज का दिन उसके जीवन का एक अहम दिन बनने वाला था,और ये तो शालिनी को भी नहीं मालूम था।
बस स्टॉप के निकट से तो वह हरदिन ही जाया करती थी, मगर आज अचानक ही एक गौर वर्णीय,ऊँची कद काठी,भूरी आँखों, मटमैली शर्ट,फटी जीन्स और टूटे जूते वाला एक युवा उसके समक्ष खड़ा हो गया था।वह रुकी और उसकी नज़र, ऊपर से नीचे तक उस युवा पर अनायास ही दौड़ गयी थी।
“आप मुझे पाँच रुपये दे सकती हैं क्या? मेरा घर चार किलोमीटर की दूरी पर है, सोचा आज बस से चला जाऊँगा, तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही है,पैदल जाना मुश्किल लग रहा है ,मगर मेरे पास बस की टिकट के भी पैसे नहीं हैं।”
शालिनी अपने दयालु स्वभाव के लिए ही अब तक चर्चित रही है।उसने अपने पर्स से दस रूपये का नोट बिन कुछ कहे उस युवा की ओर बढ़ा दिया और अपने रास्ते चली गयी।
आधे घंटे बाद, अपने रात के खाने का पैकेट लेकर,जब वो लौट रही थी, तो शाम के धुंधलके में उसे वही युवा लैंप पोस्ट के नीचे, हाथ में सिगरेट और पास में धुएँ का गुबार लिए नज़र आया।शालिनी की नज़र उसकी शातिर नज़र से एक बार टकराई थी,जो डंके की चोट पर शालिनी का उपहास कर रही थी।
आज इस घटना को बीस वर्ष बीत गए मगर शालिनी के अंदर का वो मृत दयाभाव अब भी उसी जगह सड़ रहा है ।हर पैसा माँगने वाले हाथ के लिए अब उसके पास केवल ‘न’ ही शेष है।

शुचि ‘भवि’

         

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