अब और नहीं

अब और नहीं

समाचार-पत्र लेकर बैठा ही था कि डोर बैल घनघना उठी, सोचा छुट्टी का दिन है कोई मित्र होगा। दरवाजा खोला तो पाया, बड़ी हवेली वालों का बूढ़ा नौकर है। हवेली की तरह ही बेचारा जरजर अवस्था में। बोला-” कँवर साहेब ने बुलाया है।”कहते ही नौकर जा चुका था। पत्नी जो आँगन में ही बैठी थी माथे पर बल ड़ाले बोली–” जूए में मोटी रकम हार गया होगा कर्ज चाहिये, इसीलिये बुलाया होगा,हुंम्म् बडा़ आया कँवर साब।” “अरे भागवान!गुस्सा क्यों करती हो बुलाया है तो जाना तो होगा ही।”
” जाओ, पर कहे देती हूं उस जुआरी के बहकावे में मत आना। ” पत्नी की हिदायत सुन मैं घर से चल पड़ा।कंवर सुदीप अपनी जूए की लत के कारण पुरखों की सारी जमीन बेच बेच कर खा चुके थे। दादा परदादा के जमाने की रंगीनियाँ खत्म हुई,नौकर चाकर बिना पग़ार के कब तक साथ देते,दोनों बड़े भाई अपने परिवार को ले सैक्टर में बस गये। ‘कँवर साहब’ की पूँछ लगाये अब तक अपने बीवी बच्चों के साथ यहीं पड़े थे।
हवेली के आगे काफी लोग जमा थे।तभी कँवर साब बूढ़े नौकर के साथ कलफ़ चढ़े सफेद कुर्ता-पायजामा पहने बगुला बने बाहर आये। सभी हैरान माज़रा क्या है?पर कुछ समझ नहीं आया।कंवर साब ने मुंह खोला –” आप सब जानते है हमारे दो बेटे हैं, कल ही एक कन्या ने भी हमारे यहाँ जन्म लिया है।अपने शौंक के कारण हमने कभी परिवार पर ध्यान नहीं दिया,पत्नी ने बहुत कष्ट उठाये,अपनी आत्मा की आवाज को हमेशा नकारता रहा। किन्तु अब और नहीं।” फिर थोड़ा रुक कर बोले–” आज मैं अपने शौंक की हत्या कर रहा हूं, आप सब साक्षी रहेंगे। अब मेरी पत्नी अकेली नहीं मैं भी बच्चों के पालन पोषण में उसकी मदद करुंगा।” नौकर के हाथ से ताश की गड्डी लेकर आग के हवाले कर दी।
—-राजश्री—-

         

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