परछाईं

दिनभर जलता हुआ रबर ,उसका धुँआ आँखों मे जलन पैदा कर देता है,,गले मे खराश और खांसी की शिकायत लगभग हर मजदूर को है। रोज केला मिलता है ,मेडिकल चेकअप में जब भी डॉक्टर आता है ज्यादा से ज्यादा केला खाने को बोलता है।लेकिन कितने मजदूर टी बी के मरीज हो गये। खाने का डब्बा
लेकर राशिद आखों को रुमाल से पोछता अपनी खोली की तरफ चल दिया ।
मेहरून बाहर ही अपनी तीन साल की बच्ची रुही को लिये बैठी थी।।राशिद भी बची जगह में टाँगे बाहर कर लेट गया।दिनभर खटने के बाद थक जाता है।
मामू !पानी,,, जग में पानी लिये जूही ने आवाज दी।
राशिद ने उठ कर जग थाम लिया और दो कदम बढ़ कर आखों पर खूब छीटे मारे ,मुँह धोकर पानी पिया फिर  जाकर थोड़ी ठंडक आयी,,।
गर्मी बहुत है ,,बाजी,राशिद बोला
हाँ,, ये चच्ची का खत,कहते हुए मेहरून ने पोस्टकार्ड अपनी कमीज से निकाल कर राशिद को थमा दिया
राशिद ,सचेत हो पढ़ने लगा,।
अम्मा ने कोई लड़की देखी है।जल्दी से जल्दी आने को लिखा है, आप सबके साथ,,राशिद ने कहा
अच्छा,,मेहरून खुश हो गई
जूही चाय ले आई,चाय पीते-पीते राशिद बोले जा रहा था -टिकट देखना पड़ेगा।इतनी जल्दी में टिकट का बंदोबस्त बदरू ही कर सकता है।
चाय खत्म कर राशिद टिकट के वास्ते निकल गया ।करीब घँटे डेढ़ घँटे बाद लौटा तो आश्वस्त था।बदरू ने भरोसा दिया है कि हर हाल में टिकट करवा देगा बस पैसे थोड़े ज्यादा पड़ेंगे।
चच्ची को आने का लिख तो दो,,मेहरून ने कहा
क्या फायदा ,जब तक खत पहुँचेगा हम पहुँच जायेंगे,राशिद ने जवाब दिया ।
मेहरून ने सहमति में सिर हिलाया।
सबेरे आठ बजे राशिद फैक्ट्री चला गया।
मेहरून तैयारी में लग गई ,जो भी याद आता सब समान इकठ्ठा करने लगी जल्दीबाजी में कुछ छूट न् जाये।आखिर राशिद छोटा भाई जो ठहरा ।दस साल से राशिद मेहरून के साथ है,। जब वह तेरह बरस का था आठवीं पास किया था।,पहली दफा चच्ची ने उसे मेहरून के साथ भेज दिया था।

जुबैदा चिंतित है, पता नही खत पहुँचा या नही।पहुँचा होता तो जबाब आता, जरूर।
साथ ही जुबैदा तैयारी में भी लगी है अगर सब समय पर आ गये तो क्या कुछ होना चाहिये।जब वह सिलाई करती थी तो सलवार-कमीज,ब्लाउज, पेटिकोट से जो भी कपड़ा बचता उसे सम्भाल कर रख लेती थी ।उसी कटपीस से उसने रुही, जूही की फ्रॉक, सलवार ,कमीज,और मुन्ना का कुर्ता पजामा तैयार कर लिया है।जबकि अब सिलने में आंखों में बहुत दर्द होता है।जो चश्मा है वो अब नही लगता फिर भी उसे ही लगाए किसी तरह काम चला रही है। जुबैदा का मन हर समय तैयारी में ही लगा रहता है।बिब्बो भी भाई के निकाह की सुगबुगाहट से खुश है। पीछे के गली में ही रहती है ,लेकिन रोज नही आ पाती ।
बाजी!अगले जुम्मे को रात आठ बजे ट्रेन है।टिकट हो गया।सामान तैयार कर लो,,,,राशिद ने कहा
मायके जाने औऱ भाई के निकाह की खुशी से मुस्करा पड़ी मेहरून।
चार साल बाद जा रही है मायके।रुही के होने से पहले गई थी।अभी चूड़ियां ,झुमके गोटेदार ओढ़नी खरीदनी है उसे।और भी बहुत कुछ,,,।
राशिद छुट्टी की जुगत में है।मालिक मना तो नही करेगा ।कभी उसने किसी भी मौके पर धोखा नही किया,हमेशा जब ज्यादा आर्डर मिलता है,।माल निकालने की जल्दी होती है।,राशिद ओवरटाइम से पीछे नही हटता।मालिक भी अच्छा है ,दुर्गा पूजा, या और किसी मौके पर सारे मजदूरों को घर पर बुलाकर अपने हाथ से परोसता है ,मान देता है, बार बार और लेने की मनुहार करता है।इन्ही बातों से राशिद ने कभी फैक्ट्री बदलने की सोचा भी नही।मालिक अच्छा मिलना मुश्किल है।
अपने यूनिट के इंचार्ज यूनुस मास्टर के पास जाकर राशिद ने छुट्टी की बात कही ,यूनुस भाई ने पीठ पर हाथ रख दिया ,नक्की समझो। राशिद के दिमाग का बोझ हट गया।राशिद निश्चिंत हो गया।
इतनी जल्दी जुमा आ गया ।राशिद ने सबको लेकर ट्रेन पकड़ी और सोलह घँटे के लंबे सफर के बाद अपने शहर पहुँच गया।स्टेशन पर उतरते ही राशिद के भीतर बचपन वाला राशिद जाग गया।उसने दो रिक्शे बुलाये सारा सामान लाद कर सभी के साथ दस मिनट् के भीतर वो अपने   मुहल्ले     में  था।उसकी नजरें।  चारो तरफ हर दरो – दीवार को देख रही थी।डेढ़ बरस में कुछ नही बदला, वह बिना बात मुस्करा रहा था।
बस -बस यही मस्ज़िद के सामने।
राशिद सामान उतारने लगा ,बाहर खेलते साजिद ने उसे देख चच्चा चच्चा कहता दौड़ा, पीछे पीछे वाजिद,वाहिद भी।
नजमा भी गोद में बच्चा लिये निकली ।
राशिद ने भाभी को सलाम किया ,नजमा हँसती हुई मेहरून के गले से लिपट गई,।
बच्चे भी बेहद खुश।हंसी -ठिठोली ,हुड़दंग,चिल्लपो के बीच् चाय -पानी भी चलता रहा।।
जुबैदा अभी घर नही लौटी है । वह पांच बजे तक ही घर पहुँच पाती है।एक स्कूल में दाई का काम मिल गया है।
बाहर ही बच्चों के झुंड ने जुबैदा को देख् हाथ पकड़ लिया ,जुबैदा की खुशी चेहरे पर तैर गई,जुबैदा मेहरून को गले लगा अपने को सभाल नही पाती, आँखे दोनो की नम थी,,।राशिद की भी आँखे नम हो गई।
मेहरून और रसूल मेहताब की पहली बीबी के बच्चे हैं, राशिद और बिब्बो जुबैदा के।लेकिन जुबैदा ने कभी फर्क नही किया,और न ही बच्चो ने ।
अगले दिन ही लड़की के घर पैगाम भेज और सारी बातें नक्की की गई,,,,दस दिन के भीतर ही निकाह,वलीमा सब कुछ।राशिद की छुट्टी बरबाद न् हो,अगले हफ्ते निकाह हो गया और  बानो दुल्हन बन घर आ गई, अगले दिन वलीमा।
बानो और राशिद दोनो ही खुश थे।बानो सभी के साथ अच्छी तरह हिलमिल गई।कैसे ये डेढ़ महीने गुजर गये पता ही नही चला ।राशिद को जाना था ।राशिद चला गया ।,कब आयेगा पता नही।जाते वक्त मेहरून बानो को समझा गई-चच्ची का ख्याल रखना।बानो बस खड़ी गुमसुम जबरदस्ती मुस्करा रही थी। उसके भीतर का दुख कौन जाने।थोड़े समय का पति का साथ ।फिर लम्बा इंतजार ।
राशिद जाते वक्त पास के पीसीओ का नम्बर ले गया था और पीसीओ वाले ने वादा किया था कि वो राशिद से बानो की बात करवा देगा।
हर हफ्ते राशिद बानो से बात कर लेता।कितना भी कम बात करो फिर भी बीस पच्चीस रुपये का बिल हो ही जाता।
आठ बच्चो की चच्ची बानो जिठानी को भी कुछ न करने देती नजमा भी जिठानी बन सुख उठा रही थी। बानो सुबह पांच बजे जो उठती तो रात के ग्यारह से पहले कभी खटिया न नसीब होती।बस दस रोज के लिए नैहर रह पाई,जुबैदा के रोकने के बावजूद नजमा ने रसूल को भेज बानो को बुला लिया।नजमा को भी आरामतलबी की आदत हो गई थी।
कोठरी में पहले रसूल और नजमा का हक था लेकिन राशिद के निकाह के बाद वो बानो की हो गई।राशिद के न होने से हर वक़्त सभी घुसे रहते,कोठरी के आगे बरामद भी था फिर दालान।परिवार भी बारह जनों का।
गर्मी बहुत पड़ रही है,सारी खटिया बाहर दालान में पड़ती है।कुछ रोज से जुबैदा ने बानो को भी भीतर सोने को मना किया और खटिया अपने बगल डलवा ली ।
पिछले साल इसी महीने राशिद का निकाह हुआ,दिन बीतते पता नही चलता,राशिद को गये दस महीने से ऊपर हो गया,।कैसा होगा ,,,कब आयेगा ,,,पेट जो न कराये।रोजी रोटी के लिये मेरा बच्चा परिवार से दूर वहाँ परदेश में पड़ा है,,,,इन्हीं बातों को सोचते सोचते आँखे भीगी,कब आंख लगी नही पता।
कुछ आहट हुई,जुबैदा को परछाई सी दिखी चोर समझ गोहार लगाती तभी,,अरे ,,ये क्या,,, उसने रसूल को कोठरी में जाते देखा।उसके बगल की खटिया पर बानो नही थी माजिद सुकड़ा पड़ा था।दूसरी तरफ नजमा कमीज ऊपर किये,नन्हे उसकी छाती मुँह में लिए चभक रहा था वह दोनों टांग फैलाये बेखबर गहरी नींद में सो रही थी।  दालान में       बकरी खड़ी थी ,शायद बानो और रसूल के चहलकदमी से खड़ी हो गई हो।
रसूल और बानो,,,, जुबैदा के हाथ -पैर में झनझनाहट होने लगी।पेट मे इतने जोरो की मरोड़ लगा अभी कपड़े खराब हो जायेंगे।जुबैदा सुन्न पड़ी रही।
थोड़ी देर बाद कोठरी से रसूल निकला,। बाहर नाबदान में जाकर पेशाब की और अपनी खाट पर लेट गया।जुबैदा चीखना चाहती थी,,तभी बानो निकली उसने मटके से पानी निकाल कर पिया और बगल की खटिया पर आ गई।।
जुबैदा के भीतर एक हूक सी उठी ,वो आँसू नही रोक पा रही थी ।उसने किसी से कुछ नही कहा।।
बिना कुछ खाये,तबियत ठीक नही, कह कर स्कूल चली गई।दिनभर उदास बेचैन।क्या करे ,किससे कहे।अपनी एक टांग खोलती है तो और दूसरी खोलती है तो ,नंगी तो जुबैदा ही होगी।
उसकी भूख प्यास सब गायब हो गई ,।छुट्टी के बाद वो सीधे बगल के पोस्टऑफिस में पहुँची।तार बाबू के पास जाकर हाथ जोड़ कर उसने कहा–
मुहम्मद राशिद
खोली नम्बर-12,देवीहाट,
हाबड़ा,पश्चिम बंगाल-743262
इस पते पर तार मार दीजिये।
“फौरन आ जाओ ,अम्मा बहुत बीमार है।”
तार करवाने के बाद उसे थोड़ी शांति मिली।
दूसरे रोज तार पाकर मेहरून परेशान हो उठी क्या हुआ चच्ची को।राशिद के फैक्ट्री से लौटने से पहले ही उसका सामान रख दिया।बानो के लिये एक सलवार कमीज रख दी।नई दुल्हन है उसके भी अरमान है रास्ते का खाना बांध दिया।
राशिद जब घर पहुँच कर तार पढ़ा, बाजी ने सब तैयारी कर रक्खी थी वह तुरन्त निकल पड़ा।ट्रेन में भीड़ के बीच किसी तरह बैठने की जगह मिली।मन इतनी आशंकाओं से भरा था तरह-तरह के विचार घूम रहे थे ।घबराहट हो रही थी।खाना खाने की न जगह थी, न ही इच्छा।बस पानी पीता रहा।अगले दिन शाम को घर पहुँचा,जाने क्या देखने को मिले इसी भय से ग्रस्त।जुबैदा पास की दुकान से पापे और बन खरीद कर जा रही थी,अन्यमनस्क सी।राशिद ने पुकारा अम्मा!!रुकी,राशिद को देखा और फूट कर रो पड़ी । पांच दिन से जो ज्वार सम्भाले हुये थे वह फट पड़ा।राशिद ने अम्मी को इस कदर झर -झर रोते नही देखा था।वह उसे पकड़ घर ले आया।जरूर अम्मा मरते मरते बची है,।क्या हो गया,राशिद ने पूछा
बस ऐसे ही घबराहट हुई तो बुला लिया,,जुबैदा ने कहा
अचानक राशिद को देख ,बानो,रसूल, मेहरून,बच्चे सब चौक पड़े थे।
सब कुछ सामान्य था ,राशिद दस दिन रहने के बाद जब टिकट कराने लगा जुबैदा ने कहा बेटा, दो टिकट बनवाना ,बानो भी जाएगी।अपने साथ रक्खो उसे।
बानो ने चौक कर जुबैदा को देखा था,,।।

         

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