पराया धन

बेटा चल छत पर चलें कल तो तेरी शादी है,आज हम माँ बेटी पूरी रात बातें करेंगे।चल तेरे सिर की मालिश कर दूँ,तुझे अपनी गोद में सुलाऊँ कहते कहते आशा जी की आँखें बरस पड़ती हैं। विशाखा उनके आंसू पोंछते हुए कहती है ऐसे मत रो माँ, मैं कौन सा विदेश जा रही हूँ। 2 घण्टे लगते हैं आगरा से मथुरा आने में जब चाहूंगी तब आ जाऊँगी।

विदा हो जाती है विशाखा माँ की ढेर सारी सीख लिए,मन में छोटे भाई बहनों का प्यार लिये,पापा का आशीर्वाद लिये।चाचा-चाची,दादी-बाबा,मामा-मामी, बुआ-फूफा,मौसी-मौसा सबकी ढेर सारी यादों के साथ,जल्दी आना बिटिया,आती रहना बिटिया कहते,हाथ हिलाते सबके चेहरे धुंधले हो गए थे विशाखा के आंसुओं से। संग बैठे आकाश उसे चुप कराते हुए कहते हैं सोच लो पढ़ाई करने बाहर जा रही हो।जब मन करे चली आना।

शादी के 1 साल बाद ही विशाखा के दादा जी की मृत्यु हो गयी, उस समय वो आकाश के मामा की बेटी की शादी में गयी थी,आकाश विशाखा से कहता है ऐसे शादी छोड़ कर कैसे जाएंगे विशु, दादाजी को एक न एक दिन तो जाना ही था।फिर चली जाना,चुप थी विशाखा क्योंकि माँ ने सिखा कर भेजा था अब वही तेरा घर है,जो वो लोग कहें वही करना।6 महीने पहले आनंद भईया(मामा के बेटे) की शादी में भी नहीं जा पायी थी क्योंकि सासु माँ बीमार थीं।

अब विशाखा 1 बेटी की माँ बन चुकी थी,जब उसका पांचवा महीना चल रहा था तभी चाची की बिटिया की शादी पड़ी थी,सासू माँ ने कहा दिया ऐसी हालत में कहाँ जाओगी। वो सोचती है,कैसी हालत सुबह से लेकर शाम तक सब काम करती हूँ, ठीक तो हूँ इस बार उसका बहुत मन था,इसलिए उसने आकाश से कहा मम्मी जी से बात करे और उसे शादी में लेकर चले,चाची का फोन भी आया था आकाश के पास,तो उन्होंने कहा दिया आप लोग जिद करेंगे तो मैं ले आऊँगा लेकिन कुछ गड़बड़ हुई तो जिम्मेदारी आपकी होगी।फिर तो माँ ने ही मना कर दिया,रहने दे बेटा कुछ भी हुआ तो तेरे ससुराल वाले बहुत नाराज हो जाएंगे।

वैसे तो ससुराल में विशाखा को कोई कष्ट नहीं था,किसी चीज की  कमी भी  नहीं थी,फिर भी उसे लगता था जैसे उसे जिम्मेदारियों का मुकुट पहना दिया गया हो।उसके आने से पहले भी तो लोग बीमार पड़ते होंगे,तो कैसे सम्भलता था सब,उसके आने से पहले भी तो उनके घर में शादी ब्याह पड़ते होंगे,तो आज अगर वो किसी समारोह में न जाकर अपने मायके के समारोह में चली जाए तो क्या गलत हो जाएगा।

दिन बीत रहे थे कभी 4 दिन कभी 8 दिन के लिए वो अपने मायके जाती थी और बुझे मन से लौट आती थी।विशाखा के नंद की शादी ठीक हो गयी है,उन दोनों का रिश्ता बहनो या दोस्तों जैसा है।अपनी नंद सुरभि की वजह से ही उसे ससुराल में कभी अकेलापन नहीं लगा।सुरभि की शादी होने से विशाखा जितनी खुश थी उतनी ही उदास भी थी,उसके बिना ससुराल की कल्पना भी उसके आंखों में आंसू भर देती थी। विशाखा ने शादी की सारी जिम्मेदारी बहुत अच्छे से संभाल ली थी,उसको दूसरा बच्चा होने वाला है,चौथे महीने की प्रेगनेंसी है फिर भी वो घर-बाहर का हर काम कर ले रही है।सभी रिश्तेदार विशाखा की सास से कह रहे हैं बड़ी किस्मत वाली हो जो विशाखा जैसी बहु पायी हो।
शादी का दिन भी आ गया,आज विशाखा के आँसू रुक ही नहीं रहे थे,दोनों नंद भाभी एक दूसरे को पकड़े रो रही थीं,तभी विशाखा की सास उसे समझाते हुए कहती हैं,ऐसे मत रो बेटा, कोई विदेश थोड़े ही जा रही हो जब चाहे तब आ जाना।तब सुरभि कहती है,नहीं माँ जब दिल चाहे तब नहीं आ पाऊँगी।वो पूछती हैं ऐसे क्यों कहा रही हो बेटा, माँ के पास क्यों नहीं आओगी तुम?

सुरभि कहती है,”कैसे आऊँगी माँ हो सकता जब मेरा आने का मन करे तब मेरे ससुराल में कोई बीमार पड़ जाए,कभी किसी की शादी पड़ जाए या कभी मेरा पति ही कह दे तुम अपने रिस्क पे जाओ कुछ हुआ तो फिर मुझसे मत कहना।सब एकदम अवाक रह जाते हैं,वो लोग विशाखा की तरफ देखने लगते हैं,तभी सुरभि कहने लगती है,नहीं माँ भाभी ने कभी मुझसे कुछ नहीं कहा लेकिन मैंने देखा था उनकी सूजी हुई आंखों को जब उनके दादा जी की मौत पर आप लोग शादी का जश्न मना रहे थे।मैंने महसूस की है वो बेचैनी जब आपको बुखार होने के चलते वो अपने भईया की शादी में नहीं जा पा रही थीं।मैंने महसूस किया है उस घुटन को जब भैया ने उन्हें उनकी चाची की  बेटी की शादी में जाने से मना कर दिया था,उन भईया ने जिन्होंने उनकी विदाई के वक़्त कहा था सोच लो तुम बाहर पढ़ने जा रही हो जब मन करे तब आ जाना।आपको नहीं पता भईया आपने भाभी का विश्वास तोड़ा है।

कल को मेरे ससुराल वाले भी मुझे छोटे भईया की शादी में  न आने दें तो,,सोचा है कभी आपने।पापा हमारी गुड़िया तो आपकी जान है,कभी सोचा है आप सबने कल को पापा को कुछ हो जाये और गुड़िया के ससुराल वाले उसे न आने दें।कभी भाभी की जगह खुद को रख कर देखिएगा,एक लड़की अपने जीवन के 24-25 साल जिस घर में गुजारती है,जिन रिश्तों के प्यार की खुशबू से उसका जीवन भरा होता है उसको उसी घर जाने, उन रिश्तों को महसूस करने से रोक दिया जाता है।

मुझे माफ़ कर दीजिए भाभी मैं आपके लिए कुछ नहीं कर पाई,जिन रिश्तों में बांधकर हम आपको अपने घर लाये थे वही रिश्ते वही बन्धन आपकी बेड़ियाँ बन गए और ये कहते-कहते सुरभि विशाखा के गले लग जाती है।आज सबकी आंखें नम थी ,सबके सिर अपनी गलतियों के बोझ से झुके हुए थे।

दोस्तों ये किसी एक घर की कहानी नहीं है,हमारे समाज में शादी होते ही लड़कियों की प्राथमिकताएं बदल जाती हैं।अपना परिवार अपना घर ही पराया हो जाता है,वहाँ जाने के लिए उसे दूसरों की आज्ञा लेनी पड़ती है

         

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