अंतर्मन ।

अंतर्मन की व्यथा हूँ
तुझको मैं सुनाती हूँ
चाह परिंदा उड़ जाने की
अंतर्मन से गाती हूँ।
चाहती हूँ उड़ जाऊ
परिंदा पंख कट जाती है
पपीहा बोलने से पहले ही
बहार लूट ली जाती है।
मेरे से जन्म लिए
नित नई स्वप्न सजाती हूँ
आशा का महल बनाकर ही
स्वयं पतीत हो जाती हूँ।
ऐसे समाज में जन्म लिए
खुद समझ न पाती हूँ
अपने लोगों का मैं
खुद शिकार हो जाती हूँ।
हमें भला कौन देखता है?
खुद भूखी मैं रहती हूँ
मानव को तृप्त कर मै
खुद तृप्त रह जाती हूँ।

रंजन कुमार प्रसाद

         

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