अधूरा प्रेम

पता नही कौन अचानक
यूँ ही
कर रहा था बैचैन रह-रहकर ।
फिर तुम्हारी याद
जब अश्रु बन छलक गई
कपोलों पर।
तो लग रहा है
पहले से काफी बेहतर ।
बस फिर से न आ जाऊँ
तेरी बातो में ।
ड़रती हूँ रह- रहकर।
तुमसे मिलन और विछोह
दोनों ही हैं बड़े कष्टकर।
न ही मेरा प्रेम हो सका अमर और
न ही बन सका नश्वर ।
ड़ाॅ मीनू पाण्डेय ‘नयन’

         

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