कलम

कुछ ऐसा दिल का हाल था ….
सब कुछ निढ़ाल था …..
बैचेन ये कलम थी …….
‘दिल’ को भी तलब थी …..
‘ कागज दिल ‘ ज्यों मिला इसे ……
लिखने यह बैठ गई….
पंख लगा उड़ चली…..
” चित्कला ” बन चल पड़ी …..
– उर्मिल# चित्कला✍

         

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