काव्य सृजन

#अंतराष्ट्रीय_महिला_दिवस

काव्य सृजन

देख दुनिया तेरे अंकुरण को मैं
मृत्यु के अभिशाप से बचा लायी हूँ
जन्म,मृत्यु,जरा,व्याधि की सीमाओं को
मैं लांघ आयी हूँ…….

नित नए सृजन करती हूं रिश्तो की
बेड़ियां सी बन
टूटे न ये डोर कच्ची सी दुनिया को
यह अहंनदनाद सुना आयी हूँ……..

चलो मिल हुँकार करे विश्व में नारी शक्ति
का आभास करे…….

सिमटती नही अब मैं बन छुईमुई सी
मजबूत जड़ें मेरी अटल वटवृक्ष सी
फैली है लताये चहुओर आशाओं सी
दुनिया को सूरज चाँद दिखाया
दिन धूप रात छाया सा
माँ के आँचल में अहसास कराया……..

मैं जल थल मे मैं आकाश में
नारायणी बन हर तत्व आभास में
न आदि न अंत मेरा हर मनुष्य है वंश मेरा
लोभ माया से पूजी न जाऊं
बन ज्योतिर्मय प्रकाश आच्छादित हो जाऊं
मंदिर में पूजा,नमाज मस्जिद की
शिव की काशी और मक्का बन जाऊं…..

पाल गोद मे सृष्टिकर्ता (ब्रह्मा विष्णु महेश )
को मातृ स्नेह का पयपान कराऊँ
लड़ जाऊ मैं मृत्यु से भी
साँसे जीत सावित्री कहलाऊँ
मिटा कलंक मिल अग्निदाह में
राम संयम वैदेही कहलाऊँ…………

भोजन में रस भर देती
घर आँगन खुशियों से भर देती
परिस्तिथियों को कर आलिंगन
दुःख दर्द को मैं हर लेती
विपदा आपदा को छूकर हर बार की तरह
#मनु मैं मुस्कुरा हूँ लेती………..

संघर्ष का नाम है नारी
धरा का आधार है नारी
संकेत देती हूं मैं हर बार
बचालो अपना अब वंश परिवार
भ्रूण हत्या से करो इंकार
नही तो होगी कुदरत की मार…………….

देखो कहती हूँ संभल तुम जाओ
नारी जाति का वर्चस्व संभालो
फिर न कहना सुनी न पुकार
मांगना न भीख तुम फिर बारम्बार………..

बन मैं निर्भया सह चुकी अब
जितना लूटना था लूट चुकी मैं
आक्रोश भरा है रग रग में
उठी है ज्वाला मेरे तन मन मे
बचा न पाया तू गर अबकी बार
कर दूंगी मैं भी संहार ……..

देखो कहती हूँ तुम समझ ही लेना
मेरी बात को हँसी में न लेना
मैं पुरुष तेरा आधार
बिन नारी के चाहे कर लो जो भी चमत्कार
बेटी न होगी तो बहु कहाँ से लाओगे
तुम अपना वंश कैसे चलाओगे……..

••••••••••••#मनुराज इंदौर मप्र

         

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