जज्बात

कितने खामोश थे न तुम
खामोशी तो जैसे
आदत बन गई थी तुम्हारी
मगर हाँ
सुनते तो थे
मेरी हर इक बात को
मेरी फरमाइशों को
मेरे सपनों को जीते जीते
खुद जीना भूल गए थे
और मैं
अपनी सफलताओं में
गुम होने लगी
मुझे अहसास तक न हुआ
कब चुपके से
छोड़ गए
हाँ
एक डायरी मिली
भूल गए
या
जानबूझ कर छोड़ा था
पता नहीं
जानते हो
एक एक पन्ना
कई सवाल करता है
अपराधी बन गई हूँ
तुम्हारी
आज भी सोचती हूँ
क्यूँ न बता पाए
अपने दिल की बात
आँखें तो बोलती थी तुम्हारी
क्यूँ न पढ़ पाई
तुम्हारा दर्द
क्यूँ न सुन पाई
तुम्हारी खामोशी को
काश एक बार
बस
एक बार
मुझसे कहा होता
प्यार करता हूँ तुमसे
जीना चाहता हूँ
तुम्हारे साथ
विश्वास करो
सब कुछ छोड़ देती
बस एक बार
कहा होता
अपने “काग़ज़ दिल ”
में उकेरे जज्बातों को ……
***कुमुद***

         

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