किसान का बेटा

मैं हुँ एक किसान का बेटा
शहर को क्या करने जाऊंगा
सुख दुख सब सहकर मैं
जननी जन्मभुमि की सेवा में
जीवन अपना लगाऊंगा
मैं हुँ एक किसान का बेटा
सुनें हैं चर्चें मैने भी शहरों के
करते हैं नौकरी मर मर के
चाहे हो त्योहार या बिमार
छोड़ के अपना घर परिवार
दिवस रोज एक सा बितातें है
मैं हुँ एक किसान का बेटा…
बेहतर है अपनें ही गॉव कि मिट्टी में
उगाऊंगा कुछ ऐसीं फसलें
फैलेगीं खुशबु शहरों तक
जन जन की भुख मिटाएगी
फिर हो प्रसन धन की देवी
अदभुत सुख संपदा बरसायेगी
मैं हुँ एक किसान का बेटा..
खुद कि नई पहचान बनेगी
भीड़ शहरों से ,गॉवों में बढ़ेगी
चर्चा चलेगी ऐसी चारों और
गर्व करूंगा अपने कर्मों पर
मैं हुँ एक किसान का बेटा
शहर को क्या करने जाऊंगा

         

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