जीवन दैवे वारे वृक्षा

स्थानीय भाषा में सृजित रचना।।

अबे न चेते,लग जैहे तौ, भइया भोतई घाटो।
जीवन दैवे वारे वृक्षा, इन्हें कबुहँ न काटो।।

अपने पुरखन से कछू सीखो,जिन ने इन्हें बचायो।
देवता मान के इन वृक्षन की,पूजा करवो सिखायो।
सदियन से पूजा कर रअ हो,तो अब इन्हें न छाँटो।।

अबे न चेते लग जैहे तौ,भइया भोतई घाटो।
जीवन दैवे वारे वृक्षा, इन्हें कबुहँ न काटो।।

फल दैवें,लकड़ी दे दैवें,जे दैवें सबको छाया।
आ के इनके निकट सबई ने, जीवन लाभ है पाया।
जिन ने करी दोस्ती इन से,लगो कबहुँ न घाटो।।

अबे न चेते लग जैहे तौ,भइया भोतई घाटो।
जीवन दैवे वारे वृक्षा, इन्हें कबुहँ न काटो।।

कृष्ण कान्त तिवारी “दरौनी”

         

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