नारी की नियति

बड़ी खूबसूरत लगती हैं
नयी ईंटें
अपने लाल-लाल
रंगों में
कुछ को दफना देते हैं
नींव में
और कुछ को
एक-एक कर
रखते हैं
उठ रही दीवार पे
कुछ को तोड़ा जाता है
नए सिरे से सँवार कर
फिर जोड़ा जाता है
दीवार की खूबसूरती को
अनुपम आयाम देने में
पर जब दीवार
ईंटों को आत्मसात कर
रूप गर्विता सी
खड़ी होती है
तो उसकी चमकीली पॉलिश
सदा इस सत्य को
नकार देती है
कि सृष्टि के पीछे
हाथ किसका ???
और तब हर ईंट
अपनी व्यथा छिपाए
कह उठती है
आह ! एक जैसी ही नियति
ईंट की और
समर्पिता नारी की
होती है
————– सुनीता

         

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