न थकी हूं मैं नदी हूं

मैं इस शहर की इकलौती नदी हूं
न साल दो साल एक पूरी सदी हूं

चेहरों पर थिरकती रहती हंसी हूं
शहर की तो सबसे बड़ी खुशी हूं

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शहर मेरे मैं इसके अन्दर बसी हूं
ममता के अटूट रिश्तें मैं फंसी हूं

भूंखी पेट तो अन्दर तक धंसी हूं
कंक्रीट की जंजीरों में तो बंधी हूं

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मैं बनती रही शरण बेघरों की हूं
हिय भाती जगह मनचलों की हूं

चाहत का किनारा प्रेमियों की हूं
महकती मधुर बेला मिलन की हूं

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ठहराव चहचहाते पंक्षियों की हूं
ऊंचाई उछलती मछलियों की हूं

बजती हुई घंटियां मन्दिरों की हूं
रोली पुष्प पूजा पुजारियों की हूं

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हवा में तैरती खुशबु फूलों की हूं
सघन छाया फलदार पेड़ों की हूं

शीतलता बही हुई हवाओं की हूं
बिखरी मस्ती घोर घटाओं की हूं

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आशाएं दुआएं जीवन भर की हूं
कहानी मुक्ति से मोक्ष तक की हूं

जुगत भूख से रोटियों तक की हूं
कथाएं जनम से मरन तक की हूं

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हूं अनवरत बहती रही न रुकी हूं
जोर जुलुम के सामने न झुकी हूं

जंग जारी रखती अस्तित्व की हूं
न व्यथित हूं न थकी हूं मैं नदी हूं

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रामचन्द्र दीक्षित’अशोक’

         

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