प्रतिमान

कुछ निश्चित
प्रतिमान,,
कब ऊपरी
पायदान,,
से लुढ़क
कर अंतिम,,
बनते जाते
जीवन की,,
परीक्षा की
मैरिट क्यों,,
बनती ,हमेशा
उलझी सी,,
बहुत से
परिणामो की,,
परिभाषा
समझ नही,,
आई कभी
नासमझ है हम,,
या अनुतीर्ण
तय भी नही,,
बस आशा
हैं,एक अभी,,
उत्तीर्ण हो
जाये या परीक्षा
ही निरस्त हो
शायद ,,

◆ पूनम ◆

         

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