बटोही बंजारण

सीमांत के किनारे
सिमटते हैं साये,
हवाएँ थम रही हैं
मौन इस मधुर मिलन में
!!
सूरज का यूँ
क्षितिज पर आकर
हर शाम
धरा से मिलना
जुनून है
इश्क़ की इन्तहां का
!!
सांकेतिक सा
सम्मोहन
जागे जब रूह की
छुअन
तब गहराता है
विश्वास
कि…”कोई है.. !!””
आसपास
!!
कोई है जो
मजहबी ताकतों से परे
मेरे अरमानों को
अपनी
साँसों में सींच रहा है
कि मैं रह सकूँ
रिश्तों में एक फरिश्ता
बन कर
!!
बटोही बंजारण सी
मेरी आँखें
तब
उजडे ख्वाबों की ताबीर
सँवारने लगती है
बैरागी बांवरे की टोह में
सुकून की ज़मीन पर
पनाह पाकर
!!
💫दीप💫

         

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