मन्नत

कैसे कह देते हम ख़्वाहिशें दिल की
मन्नतें थी कहीं जो   कागज़ दिल की
तुमसे मिलकर शुरु हुई जो दास्ताँ
ख्वाबों पे भी  मलकियत रही दिल की !
कामनी गुप्ता ***
जम्मू !

         

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