मानव से मानव ठगा सा

वो अर्थ हीन है ,
ऐश्वर्य से परे सा ।
अर्थ हीन होकर भी ,
अर्थ से भरा सा ।
रुकता नही जो कभी,
वो ज़ीवन से भरा सा ।
ओढ़ता अंबर वो ,
बिछौना धरा हरा सा ।
चला जहाँ से वो ,
आज वहीं खड़ा सा ।
हारकर कर भी वो ,
हालात से लड़ा सा ।
देखता “निश्चल” मन से ,
मानव से मानव ठगा सा ।
…. विवेक दुबे”निश्चल”@….

         

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