मानव धरती पर

कविता (छन्द मुक्त)-: मानव
••••••
मानव धरती पर
जन्म लिया
वनों में रहन-सहन
होने की वजह
वनमानुष कहलाया
कुछ समय बाद
घर मकान बनाकर
एक समाज के तहत
आपस में ताल मेल कर
रहन सहन अपनाया
मानुष कहलाया
कुछ और आगे बढा
बुद्धि का प्रयोग किया
मानवता अन्दर लाया
तब
मानव का दर्जा पाया
मानवता की चरम सीमा ने
मानव को ही
बाटने का कार्य किया

पहले तो कई धर्म में बाटा
उससे कुछ
उन्मादी मानव का
अपना वर्चस्व
कायम नहीं दिखा तो-
फिर कई जातियाँ बना दी
इन जातियों के चक्की में
सदियों से
बहुत से मानव पीसते रहे
बहुतों ने दरदर की
ठोकरें खाते रहे
तड़पते हुए
मरते रहे
सहते रहे
इनके तड़पने
मरने,ठोकरें खाने को
देखकर
खुश हुआ करते
कुछ मानव

कैसी विडंबना है
आदिम प्रजाति
आदि मानव
वनों में निवास
कन्द मुल मांस आहार
वनमानुष
गाँवों में आवास
प्राकृतिक वातावरण
मानव
शहर ही शहर सर्वत्र
कहर ही कहर
जहर ही जहर
मानवता विलुप्त

कब होगा परिवर्तन
कब होगा खुशी नर्तन
कब लौटेंगे मानव
कब मिटेंगे दानव
क्या ओ दिन आयेगा
सभी एक हो जायेगा
वर्ग जाति मिटकर
द्वेषरहित बनकर
एक जाति कहलायेंगे
साथ समय बितायेंगे
क्या हंसते हुए हर पल
मिलकर हर्षयुक्त
माहौल बनायेंगे
अगर यह प्रश्न
हुआ अधूरा
सपना नहीं होगा पूरा
प्रश्न बड़ा अजीब है
विध्वंस करीब है

सत्ता लोभ के मद में चूर
उच्च स्तर में मगरूर
निम्न स्तर के साथ
चलेंगे मिलाकर हाथ
हमें सन्देह है
ये ऐसा नहीं करेंगे
अधिकार क्षेत्र की बात
कर रहे सदियों से अत्याचार
लड़ने को होंगे तैयार
मानव,दानव बन जायेंगे
आपस में टकरायेंगे
लड़ कटकर मर जायेंगे।

रचनाकाल -: 15/04/2018
©रमेश कुमार सिंह ‘रुद्र’

         

Share: