मेरा मन

रफ्तार से भागता है मन
ना जाने हर समय
कहां कहां पहुँचता है मन,
कभी शान्त सरोवर
तो कभी उफनता नीला समन्दर ,
कभी बाँसुरी के उदास स्वर में
कभी खुशियों के भंवर में,
अपने अतीत को बिसारते हुए
सपनों को अपने आकार देते हुए,
मन चला जा रहा है
बिना रुके बिना थके
आशाओं निराशाओं से परे,
कभी रोते हुए कभी खिलखिलाते हुए
एक आस की डोर पकड़े हुए,
काश,पकड़ा सकती मैं
मन के बेलगाम घोड़ों को एक छोर,
तो रुक जाता जाने से वह
एक अन्तहीन मंजिल की ओर !

★वन्दना★

         

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