मैं. खुद को लिखती हूं

मैं खुद को लिखती हूं
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मैं दर्द लिखती हूं
किसी ओर की नही
अपनी हयात लिखती हूं।
ना रस ,ना छंद ,
ना गैरो की चर्चा।
मै ढलती शाम,
अपनी कहानी लिखती हूँ।
मन पंछी बेचैन मेरा
तिनका -तिनका मैं,
जब थक जाती हूं
ज्बातो के तहरिर, लिखती हूं।
निर जो बहता है, बनके खारा
समुन्द्र मे डूब के
मैं रोज उभरती हूं।
ईज़ात होते हैं जब
नये गम के फसांने
चार दिवारो की तन्हाई।
उखड़ा हुआ पलस्तर,
अस्त -व्यस्त जीवन की
लकिरे लिखती हूं।
अमावस का अधेंरा
काली रातो की स्हांई
ओर कभी ड़गंमगांते,
जीवन दीप की लौ।
मै माटी का दिया,
खुद को करने रोशन
शाम ढले जलती हूं।
ईजाफा हो जाता ओर भी
शबे ए गम का जब,
नैनो के काजल से
अपने खातो के पन्नों पे
अपनी सुबह ,
अपनी शाम लिखती हूँ।
किसी और की नही बात
अपना ही नग्मा ,
अपना फसाना लिखती हूँ।
साथी मुखर्जी (टीना)

         

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