यादें पुकारती हैं

कुछ यादें
पुकारती है बहुत दूर से
कभी बचपन से..…
कभी जवानी से….

बनती है आँखों में
एक धुंधली सी चलचित्र
बुदबुदाती है कानों में
यादों की मीठी पुकार धीमे से

बहुत दूर निकल जाती हूँ
यादों के साए में खोकर
पर स्मृतियों के आईने में
सब बिखरा सा नजर आता है

वक्त की सरकती रेत पर
ढह गए बीते दिनों के पल
विराम, सुषुप्त से हो गए
किस्से कहानियां के नटखट दिन

दिल के कागज पर खिंची थी जो तस्वीर
आज आधुनिकता की अंधी दौर में
मृगतृष्णा सी हो गई है…..

उम्र अपने ढलान पर है
पर फिरभी यादें जाती नहीं दिल से
आज भी यादें याद आते ही
दिल को बच्चा कर जाती है

कुछ यादें पुकारती है बहुत दूर से
कभी बचपन से…..
कभी जवानी से…..

         

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