याद

आज तक याद न आई थी कभी
अब जो आई तो वो बोहोत आई
सोचता था कि आयेगी वो तनहा तनहा
वो मगर साथ में खोई हुई रातें लाई
वही रातें,जिनमें मेरा अज़ीज़ मेरे साथ होता था
चाँद हँसता था सितारों से अब्र आबाद होता था
वो छेड़ता था कोई राग फिर कुछ इस क़दर
नाच उठता था सारा आलम होने तक सहर
उस को आज भी वही रुतबा इख़्तियार था
मुझ को आज भी शिद्द्त से उसका इंतज़ार था
कोई आहट हुई और घूम के देखा मैनें
वो कोई और नहीँ बेमुरव्वत याद ही थी…..
भरत दीप

         

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