शब्दबाण

शब्दबाण

मैं बन पुस्तक पवन सी
ले कर अपनी प्रिय लेखनी ,
दिल को कागज़ कर डालूँ
जीवन पुस्तक को शब्दों
के दिव्य रूप से भर डालू ,
शब्दों के ही ब्रह्मशस्त्र से
जीवन युद्ध विजय पाए ,
नारी का जब नाम कोई ले
मेरा ध्यान उसे आये,
गौरव का कारण बन पाऊँ
ऐसा स्वप्न नहीं मेरा ,
पर अपमान बनू नारी का
ऐसा समय नहीं आये ,
जीवन तरकश में शब्द बाण
हर दुविधा को घायल कर दे ,
और सहज की जीवनधर्म निभा
अपनी मुक्ति डगर तक जा पाए,
शब्द मेरे बाकी रह जाए
जब ये प्राण निकल जाए।
प्रणाम
शिखा नारी

         

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