शब्द और जज्बात

आज बेहद गर्मी का दिन…..
गर्म हवायें इस गर्मी को और हवा दे रही हैं …..
ठीक वैसे जहां सिर्फ शब्द हैं…. जज्बात नहीं …..
चार दिन पहले की बात है….
कितना सुहाना मौसम…..
जाने कहां से काले बादल आये……
खूब झूम कर बरसे….
जैसे जज्बातों की बारिश हो…..
कुछ ऐसा ही तो रिश्ता है ……
शब्द और जज्बात का …..
दोनों एक दुसरे के बिना अधुरे ….
बाहर गर्म हवायें और कमरे में कूलर की ठण्डक …..
( जी हां कूलर क्योंकि ए.सी. के बन्द कमरों में जज्बात नहीं होते)
तुम्हारी डायरी के पन्ने पलट रही थी…
अचानक एक रचना सामने आई ……
जिसमें सिर्फ शब्द लिखे थे…..
ये वही रचना थी …. जिसमें तुमने कहा था ……
‘उर्मि’ मेरे पास शब्दों का भण्डार है ……..
तुम्हारे पास जज्बात हैं ….. तुम इन शब्दों में…..
जज्बात .. भावनायें.. भर दो…….
रचना सम्पूर्ण हो जायेगी…..
हम दोनों भी उसी तरह ….. अपना जीवन .. आगे बढ़ायेंगे….
नही !!….. मैने कहा था ….. तुम सिर्फ दोस्त हो ….और कुछ नहीं ….
तुम नाराज होकर …. अपनी डायरी वहीं छोड़ कर चले गये……
याद है मुझे…. क्योंकि मैं गलत नहीं थी ….
कुछ दिन बाद तुम्हारा ख़त मिला……
तुम विदेश चले गये … नाटक कम्पनी से जुड़ गये…
खत में भी कोई जज्बात नहीं थे…
सिर्फ शब्दों का ताना बाना …..
आज फिर उन्ही शब्दों को पढ़ रही हूँ …..
उसमें भाव भरने की कोशिश की थी मैंने…
नहीं भर पाई …… कैसे भाव दे सकती हूँ ???
जो शब्द मेरे नहीं तो जज़्बात कैसे भरूं!!!
बेशक मेरे पास भण्डार नहीं है शब्दों का …..
लेकिन खुश हूँ ,कम शब्दों के साथ …..
सरल शब्दों में जज्बातों को जीती हूँ मैं….
सहेजती हूँ उन रिश्तों कों…..
जो मेरे अपने हैं …….
कभी उन की बचपन की यादों में…
तो कभी उनकी खट्टी -मीठी तकरारों में …..
जी लेती हूँ सभी खुशी और दुःख के लम्हों को…
जो मेरे शब्दों .. जज्बातों… के साथ…… परछाइ ….
के जैसे साथ चलते है …..
बालों की सफेदी …… चेहरे की लकीरें……..
भली लगती है मुझे …… क्योकि…
मेरे शब्दों में मेरे जज्बात ….. मेरी रुह तक बसे हैं …..

– उर्मिल📖✍#चित्कला

         

Share: