समझौता

क्यूँ मुझे महसूस होता नहीं
बेइंतहाई उसके प्यार की
क्यूँ असर होता नहीं अब
धड़कते दिल के इकरार की ।।

मैं ही उसकी धड़कन हूँ
हूँ मैं उसकी यादों में
मैं बसी हर पल में उसके
मैं ही उसकी बातों में ।।

हर घड़ी जहन पे उसके
याद का मेरी पहरा है
सूनी-सूनी आंखों में
बसा मेरा ही चेहरा है ।।

न जाने कैसा रिश्ता है
न जाने कैसा बंधन है
पास होके, भी होती दूर
सखी अजब सी उलझन है ।।

उसकी आँखें,,,,,,,
हर पल मेरी याद में बरसे
उसकी बांहे,,,,,,,,,,
लेने को आगोश में तरसे
मेरी बातें,,,,,,,,,,,,,,
गूंजे उसके कानों में
मेरी रातें,,,,,,,,,,,,,,,,,
रोज कटे मयखानों में ।।

वो तो मेरा कुछ भी नहीं
फिर मैं क्यूँ उसकी धड़कन हूँ
वो मेरा एक कतरा भी न फिर
मैं क्यों उसकी दर्पण हूँ ? ? ?

लोग कहे बे दर्द मुझे
वो कहे हर जाई है
रिश्ता चाहे कुछ भी हो
पर स्वरा तो चीज़ पराई है ।।

ये रिश्ता हम दोनों का
एक समझौता है,सौदा है
सुलझ सुलझ के उलझ रही
कठिन बना ये मसौदा है ।।

ये समझौता है,,,,,,,,,,
उम्र का, तज़ुर्बे का
ये समझौता है,,,,,,,,,,
चाहत का,मोहब्बत का
ये समझौता है,,,,,,,,,,,
रस्मों और रिवाजों का
ये समझौता है ,,,,,,,,,,,
बस रिश्तों के तक़ाज़ों का ।।

थी जिसकी मुझको चाहत
उसकी उसे जरूरत है
जमीं-आसमां की-सी ही
हमदोनों की उल्फ़त है ।।

जिसनें रिश्तों को उलझा रखा है
चाहत-जरूरत,जरूरत-चाहत है
एक कदम अगर जरूरत है
तो चार कदम पर चाहत है ।।

मुश्किल बन कर बैठ गया
है चाहत मेरी राहों पर
शायद शेष गुज़र होगी
अब तो केवल आहों पर ।।

स्वराक्षी स्वरा
खगड़िया बिहार

         

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