सर्वकालिक मुहब्बत

 

तेरी यादें कश्तीं मेरी डुबोतीं रही।
इस तरह मुहब्बत मुझे भिगोती रही।

अब नहीं,तब नहीं,कब नहीं था जुनून?
दिल्लगी हर एक दौर में होती रही।

लौटकर न आया कभी वो जाने वाला,
बयारे इश्क़ में राधा ही बस रोती रही।

किस्से निराले हैं इस जमाने में मुहब्बत के,
खिलाफ़त में भी दुनियाँ इन्हें संजोती रही।

कृष्ण कान्त तिवारी “दरौनी”

         

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