सांपो की कहानी

लचकती छरहरी काया इसकी,
जल-थल-नभ वास है
निज अँग भरा विष अपने,
यह प्रमुख हथियार है l

लिपट गले यह शंकर,
करता विकट श्रृंगार है
उठा रखा धरती सिर अपने,
ऐसा जग विख्यात है l

कही सपेरों संग मिल यह,
अदभुत खेल दिखाते
नाच-नाचकर यह,
इसका व्यापार चलाते l
तिथि पंचमी अवतार मना,
करते जन-जन इसकी पूजा
घुस जाए दिवस घर यह जिसके,
लठ् मार भगाते यमलोका ll

         

Share: