सोचा आज

सोचा आज
थोड़ा मैं भी
कुछ नींदें घूम आऊँ

उस सोते किसान के
सपनों में लहलहाती
कुछ फसलें दे आऊँ

बाला के
सपनों में जाकर
सलोना
सुशिक्षित संस्कारी
कुमार एक दे आऊँ

बूढ़े बाबा की
टूटी लाठी एक
उनके सपने में जाकर
जोड़ तो आऊँ

भूखा सोया बच्चा
न जाग जाये
उसको कुछ निवाले
सपने में जाकर
खिला तो आऊँ

बूढ़ी माँ के
लाडले कोे
सपने में ही
मिलवा तो आऊँ

समन्दर कुछ मीठे कर आऊँ
निदियों में पानी भर आऊँ

बिन खिड़की बिन दरवाजों के
कुछ घरों को रौशनी दे आऊँ

दर्द औरों के रोते हैं जो
उनके कुछ आँसूं ले आऊँ

मरणासन्न हुए कई जीवन
उनमें जीजिविषा भर आऊँ

मौत से पहले मरने से अच्छा
कुछ जिन्दा लम्हे जी आऊँ

सोचा आज
बस यूँ ही हमने
कुछ नींदें घूम ही आऊँ,,,,,

शुचि(भवि)

         

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