स्वपन्

यार मेरे सुन कल के दिन
मुझपे इक सौगात हुई ।
गर्मी के मौसम में ज्यों
बिन बादल की बरसात हुई ।।

सुबह सुबह जब निकला घर से
लगा कि कोई ताक रहा था ।
पीछे मुड़कर देखा हमने
खिड़की से कोई झांक रहा था ।।

हाथ हवा में उसने मारा
लगा हमे ज्यों ताज हमारा ।
हाथ से उसने किया इशारा
दिल अपना फँस गया बेचारा ।।

जल्दी से वो दौड़ के आए
जाने क्या ऐसी बात हुई ।
यार मेरे सुन कल के दिन
बिन बादल की बरसात हुई ।।

बाइक पे वो बैठे हमारी
लगा घुमाएं दुनिया सारी ।
बस पेट्रोल का खर्चा था
वरना अपना चर्चा था ।।

न जाने क्यों हवा में उसका
हाथ मेरे से छूट गया ।
इतना अच्छा स्वपन था ” साहिल ”
इक झटके में टूट गया ।।

रचनाकार
गजेन्द्र मेहरा ‘साहिल’
गाडरवारा (म.प्र.)

         

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