अंतिम….

जीवन और मृत्यु के
दो छोरों के बीच
झूलता, हिचकोले खाता
एक जीवन …..
मृत्यु का भय
अपरिचित आगत का डर
अपनो से विछोह का दंश
अंतिम तीव्रतम पीड़ा का त्रास
कुल मिला कर सारे जीवन की
निर्धारित अंतिम परिणति
साथ ही मोह का ऐसा धागा
जो टूटता नहीं अंतिम श्वास तक
इसे बलात तोड़ने का कार्यभार
काल को सौंपा गया है
अंतिम क्षण तक
एक और क्षण जीने का लोभ
और दूसरी तरफ हर क्षण
टूटती हुई श्वास श्रृखला
मस्तिष्क के चारों तरफ
घेरा डाले हुए
स्वर्ग-नर्क परिभाषित करती
समस्त श्रुतियाँ
कहीं यह संदेह कि कहीं
यह सब सच न हुआ तो ?
और कहीं यह भय अगर
यह सब सच हुआ तब ?
पूरे जीवनकाल में सहेजा हुआ
दुर्घर्ष साहस, इस चरम बिंदु पर
पहुँचते ही निरुपाय हो जाता है
लाचार, भयाक्रांत प्राण पखेरू
परिणाम जानते बूझते भी
पिजड़े की दीवारों से
चिपका रहता है
जबरदस्ती खींचे जाने तक I

         

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