उठ युवा

मेरे युवा दोस्त!
शब्दों का छोटा या बड़ा होना,
उनका स्थायित्व –
उनमें पाया जाने गुण धर्म
सार तत्व लिए हुए तो होता है ।
जबकि अंको में दिखती _
अस्थिरता, स्वार्थ ,लोभ और मिथक
और
साथ ही परिलक्षित होती है
मिथ्या दंभ की जुगुप्सा ।
उठ !
युवा उठ!
समाज को _
शब्दों और अंको से विमुख कर
उसे सहज, सरल और सीधी
स्वाभिमान भरी रेखा की
तरफ  ले चल –
“जहाँ चतुर्भुज बनता है ।”

मधु खंडेलवाल
दिल्ली

         

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