कल्पना एक शक्ति एक कला

कल्पना एक शक्ति एक कला

कल्पना निरभ्र गगन में उन्मुक्त पंछी
कल्पना रोचक रोमांचक स्वछंद उड़ान।
कल्पना सप्तरंगी सपनों का मधु प्रारब्ध,
मन देह की सीमाओं में जो नहीं होती आबद्ध।

कल्पना हृदय सरोवर नव तरंगें,
व्याप्त हो अंतरिक्ष की परिधि भी रंगे।
कल्पना जीवन के बहुविध रंगों की उकेरन
कल्पना से पाता नव आत्मविश्वास कोमल मन।

ठहराव से इसके जीवन बेरस हो जाता,
बहाव से इसके नव अंकुर कोंपल फूटता।
कल्पना सुरम्य तरंगों और सरसता का आलोक,
भौतिक क्षमता को पंख देने का इसको शोंक।

शीतल छाँव सी होती है सुखद कल्पना
अंगारों की जलन होती है दुखद कल्पना।
बनावट-बुनावट इसकी अति मार्मिक
सुकल्पना नहीं करती भेद राजा-श्रमिक।

कल्पना परिष्कृत बुद्धि की उड़ान,
जीवन में व्यापक अस्तित्व का स्पर्श।
कल्पना साधक करते तमाम रहस्य अनावृत,
नव साधनाओं के प्रार्दुभाव से हटाते जटिल गर्द।

कल्पना मौलिक प्रतिभा का विकास,
कल्पना अपार ऊर्जा की खपत।
सृजनशीलता ही अनंतऊर्जा की दिशा,
जिससे अनछुए पहलुओं को जाता छुआ।

सामान्यतः क्यों करता मनु इसका दुरुपयोग,
यह त्याग है नहीं है कोई भोग।
इच्छा, वासना से अक्रांत हृदय,
कुकल्पना का आदी हो जाता है।
दो अगर ध्यान तो, अनगढ़ कल्पनाओं को सँवारा जाता है।

किसी विशिष्ट कार्य में कल्पना की ऊर्जा उडेलो तो होगा बचाव
कल्पना की प्रगाढ़ता से आएगा,नव निर्मल अविरल नद सा प्रवाह
इच्छा वस्तु मन में प्रतिबिम्बित व साक्षात साकार होगी
दिव्य कल्प रौशनी से कुकल्पना खरपतवार खार होगी।

फिर से नीलम कल्पना अपनी रोमांचक यात्रा पथ पर चल निकलेगी।
सुन, ध्यान-योग की सतरंगी कूची से सुकल्पना मचल निकलेगी।

नीलम शर्मा…..✍

         

Share: